इश्तिहार वाली औरत

वह खुद नहीं लिखतीं पर अपने पति के लिखे हुए को इश्तिहार की तरह सब दीवारों पर चिपका आती हैं । इससे एक बात तो तय है, वह लिखे हुए को नज़रअंदाज़ नहीं कर पाती हैं जब वह उनके पति द्वारा लिखा गया होता है। इधर वह लिख भी ख़ूब रहे हैं । जिस तरह से हम बीत रहे समय को अपनी नज़र से गुज़रता हुआ देख रहे हैं, तब उनकी योग्यता बिल्ली या चमगादड़ की तरह जान पड़ती है। वह व्याख्या कर रहे हैं । विश्लेषण में कितने ही तरह के दोहरावों के बाद भी पीछे हट नहीं रहे। वह सामाजिक रूप से चेतस व्यक्ति की तरह बर्ताव करना चाहते हैं । बोलते भी उसी तरह हैं । इसमें दिखता है, वह एक आले दर्ज़े के मर्मज्ञ हैं । इस सबमें अब हम उन्हें अपने समाज में स्थित करने की कोशिश करते हैं, जो समूची वैचारिक प्रक्रिया में अनुपस्थित हैं । यह नेपथ्य किस तरह से उन्हें रच रहा है? अगर हम यहाँ इन जैसे अनलिखे प्रश्नों को देखें, तब हमें क्या मिलता है? रेत। रेत से साने हाथ। क्या हाथ कुछ भी नहीं लगता । ऐसा नहीं है । उस उम्र में जब वह युवती रही होंगी और यह लेखक पति उस ओर आकर्षण महसूस करता होगा, तब के क्षणों को हम अपनी कल्पना से रच सकते हैं? तब एक तय जगह होगी, जहाँ दोनों मिला करते होंगे। चलिये, मान लेते हैं, वह जगह क्रमशः दोनों के अलग-अलग घर रहे होंगे । कभी बागीचा, चाय घर भी होंगे, जो बाद में जुड़े होंगे। एक वक़्त के बाद दोनों पढ़े लिखे लोग एक साथ जिंदगी बिताने का फैसला करते हैं । शादी के बाद साथ रहने लगते हैं । सामी के साथ घर बदले । शहर बदले। जगह बदली। साथ बना रहा। एक बार के लिए यह सारी बातें सरासर झूठ भी हो सकती हैं। शायद हों भी। लेकिन हैं नहीं ।

अब यहाँ एक दूसरा दृश्य घटित होता है। पुरुष को किसी विश्वविद्यालय में प्राध्यापक नियुक्त हुए ज़माना बीत गया । स्त्री उस जमाने में कहीं पीछे ठहर कर पति को आगे जाता देखती रही । वह भी बहुत कुछ कर सकती थी । ऐसा नहीं है, उसने किया नहीं । वह जो कर रही है, उसका नोटिस भी उसे ख़ुद लेना पड़ रहा है । छत खाली है, अब मैं कुछ छत पर ही करूंगी । जिन छात्रों की राशनिंग पति की कक्षाओं से होती रही, उन्हें कच्चे माल की तरह देखने की शुरुवात यहीं होती होगी । वह बात करेंगी । निरुद्देश्य नहीं । विषयवार चर्चा। जिसमें रस हो । लोग भीड़ की तरह नहीं कम से कम ख़ुद को वहाँ उपस्थित रखने की इच्छा से स्वतः भर जाएँ । हो सकता है, इसमें कई सारी डिटेल्स या बारीकियाँ नहीं हैं । वह सूक्ष्म ब्यौरे नहीं हैं, जिन्हें उपरोक्त रिक्त स्थानों को भर लेना चाहिए था । यह भी कहा जा सकता है, इसमें स्त्री पीड़ित की तरह लग रही है । ज़िंदगी में साथ चलते-चलते पुरुष आगे निकल गया। स्त्री कहीं पीछे छूट जाने से डरती हुई, उस भय को अपने पास से परछाईं की तरह दूर करने की इच्छा से भर गयी है। यह प्रश्न भी पूछा जा सकता है, किसी वास्तविक जीवनक्रम को यहाँ लिखने का क्या उद्देश्य है ? इन सारी बातों से मैं बस एक बात ही कहना और रेखांकित करना चाहता हूँ। वह स्त्री उस पुरुष के साथ इसलिए तो नहीं चली थी, कि वह अपने पति के लिखे हुए शब्दों का इश्तिहार बन जाये।

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