अनकहा

बहुत दिन हो गए कुछ लिखा नहीं गया । सोच रहा हूँ यह लिखना ज़रूरी क्यों है ? क्यों कोई लिखता रहे? इस लिखने में क्या सारी चीज़ें समा सकती हैं? सारी चीजों से अभी मेरा मतलब सिर्फ़ उस स्वाद से है, जब बहुत साल पहले हम नानी घर में थे और नानी के बुलाने पर सीढ़ियों से उतरते हुए अरहर की बटुली चूल्हे पर चुर रही थी । दाल बनने वाली थी और वह चावल धो रही थीं। उस तरह की दाल मैंने कभी नहीं खाई । इसे मैं कैसे लिख सकता हूँ, मुझे यही समझ नहीं आ रहा है । कोई हो जानकार, जो मुझे यह समझा सके कि कल रात से जब पापा गाजर का हलवा कड़ाही में छौंक लगा रहे थे, तबसे तीन बार पूछ चुके हैं, हलुआ खाया । इस पूछने में क्या है, जिसे लिख नहीं पा रहा? वह मुझसे क्या जान लेना चाहते होंगे? मुझे पता नहीं चल पा रहा ।

इतने सालों से मम्मी जो बैंगन का भरता बना रही हैं, उनके हाथों की रोटियों की मोटाई और उसके गले के अंदर जाते हुए भाव को कैसे किसी भाषा में लिख सकता हूँ ? यह जो रोजाना तुम रसोई में कुछ-कुछ बना रही होगी, उसे कैसे व्यक्त किया जा सकता है, यही सब मुझे उलझाये हुए है । जो चटनी उस दिन मैंने सिल बट्टे पर पीसी थी, उसे भी नहीं कह पा रहा । वह क्या थी ? मैंने पहली बार धनिया, नमक, मिर्च को एक साथ घुलते हुए इतनी पास से देखा । उसमें जो रंग बह रहा था, उस गंध को अभी भी अपने शब्दों में कहने के लिए कोई तरक़ीब लगा रहा हूँ । पर कुछ भी नहीं हो रहा । यह लिखना इस तरह मुझे चालाकी लगता है । वह जो रोज़ चूल्हे की आग के साथ घुलते मिलते घी, तेल, मसाले, आटा चावल हैं, इन्हें हम कभी दर्ज़ नहीं कर पा रहे । हम इस भोजन के सबसे पास हैं । उसे रूप, गंध, स्पर्श, स्वाद सबसे एक साथ गुजरते हुए भी कह नहीं पा रहे ।

लिखने की चाह और उसका दावा करने वाले दरअसल झूठे, मक्कार, काइयाँ और चालबाज़ लोग हैं । वह कभी नहीं बताएँगे, उनके पेट और अंतड़ियों में फंसे भोजन को किसी ने कला की तरह ही उकेरा है । वह बस अपने श्रम को बहुमूल्य घोषित करते रहेंगे । कभी रसोई में अपनी सारी ज़िंदगी बिता देने वाले दिनों को अपनी आँखों के सामने से गुजरने नहीं देंगे । यह सच है, वह प्रक्रिया नहीं उत्पाद के दर्शक हैं । उनका पैमाना सिर्फ़ स्वाद है । वह बस उसे पसंद और नापसंद में क़ैद करके रख लेंगे । इसकी जो स्मृति है, वह क्यों है? यही समझ नहीं आता । वह डरते भी हैं, अगर वह यह सब कह पाये, तब उनके लिखे हुए शब्दों की सीमाओं से सब परिचित हो जाएंगे । वह नहीं चाहते किसी को पता चले उसके आगे हमारे शब्द कितने कमजोर असहाय हैं । ऐसा नहीं है, उसमें सब कहा जा सकता है । बहुत कुछ है, जो हमेशा, हर बार अनकहा रह जाता है ।

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