टूटते रहना

कभी-कभी थक जाना भी ज़रूरी है । थक कर सिर्फ़ सोया नहीं जाता । थोड़ा सोचा भी जाता है । यही वह अवकाश है, जब हम अपने आप को सबसे ज़्यादा महसूस करते हैं । हम शरीर में वह जगह टटोलते हैं, जहाँ से हम सबसे ज़्यादा परेशान होते हैं । इस जगह जहाँ अभी लिख रहा हूँ, काफ़ी लंबा अरसा गुज़र गया है । लगभग सात साल या कुछ उससे भी ज़्यादा । हर दिन की निरंतरता लिखने में भले न रही हो पर मन में लिखने की इच्छा कभी कम तो कभी ज़्यादा, कमोबेश हमेशा बनी रही । दिमाग इन बीते दिनों में सबसे ज़्यादा यहीं खपत करता रहा है । इसमें एक ऐसा वक़्त आता है, जब हम कह नहीं पाते । दूसरे शब्दों में, एक विधा हमारी सभी बातों को समेट नहीं पाती, तब क्या करें? शायद यह इसके भी बाहर की बात हो । मतलब यह सिर्फ़ फ़ॉर्म या रूपाकार की बात भी न हो । तब क्या करें? थोड़ा रुक जाएँ या चलते रहें? लगता है, थोड़ा थम गया हूँ । असल में इस थम जाने में भी मन रुका नहीं है । वह भाग रहा है । इसे विचलित होना नहीं कहेंगे पर यह इसी के आसपास है । मैं जो कहना चाहता हूँ, अब इस तरह कहना नहीं चाहता, जैसे अब तक कहता आया हूँ । इसमें सिर्फ़ दोहराव की बात नहीं है । मुझे बातें दोहराने से ज़्यादा ख़लता है, उन्हें उसी तरह दोहराते हुए कहते रहना । जबकि मन उन्हें थोड़ी कोशिश के बाद कहीं और स्थित कर सकता है । यह सत्य को अपने से दो कदम की दूरी पर रखने जैसा नहीं है । न ही वस्तुस्थिति को अपने से अलग कर लेने की ज़िद । यह बात है ख़ुद के लगातार एक जैसी मनः स्थिति में डूबते रहने की ।

ऐसे में कई दिन हुए कुछ नहीं लिख पा रहा । चुप सब अपने अंदर घटते हुए देख रहा हूँ । देख रहा हूँ यह क्या है, जो मेरे अंदर उतर रहा है । क्या ऐसी संभावना है, जिसमें उस कथ्य के साथ कुछ और तरह से हाथ लगाने से वह अपनी आकृति को बदल सकता है ? इसमें एक बात गौर करने वाली है । कल और उससे भी पहले जब अपने पिछले दो साल की लिखी बातों को पढ़ रहा हूँ, तब लगता है, जब हम साथ होते हैं, तब मेरे अंदर रचनात्मकता किसी दूसरे स्तर पर सहसा पहुँच जाती है । मैं ख़ुद के दायरे में रहकर भी कुछ इस तरह से कहता हूँ कि वह सब अपने चरित्र में कमोबेश वैसे रहते हुए भी लगती नहीं हैं । यह वहीं बातें हैं, जो तुम्हारे साथ न रहने पर लिखुंगा, तो मुझे किसी दूसरी तरह से घेर लेंगी, जहाँ मेरा दिमाग काम करना बंद कर देगा । बीता साल एक ख़राब साल है । हर स्तर पर इसने मेरी ऊर्जा को कोई सही उपयोग नहीं करने दिया है । इस हानि को शायद लिखकर भी व्यक्त या कह नहीं सकता । यह क्षति सिर्फ़ लेखक के रूप में नहीं एक ठीक-ठाक व्यक्ति न बन पाने के स्तर पर भी रेखांकित की जानी चाहिए । सहचर्य सिर्फ़ साथ चलना नहीं है । अपने को उधेड़ते हुए फ़िर से बुनना है । जो बदल जाएगा, या पीछे छूट जाएगा, वह शायद पीछे छूटने या बदल जाने के ही लिए रहा होगा । इसी बात को साल भर से अपने भीतर स्थगित या छूटा हुआ महसूस कर रहा हूँ । यह छूटना टूटते रहना है ।

(इसे ब्लॉग में  साल भर और जुड़ जाने के दिन ही आना था, या उसके एक दिन बाद दो जनवरी को । पर देर आए दुरुस्त आए । ज़रूरी है लौट-लौट वापस आना । अब कुल साल हुए हैं दो । हम तीसरे साल में दाख़िल हो गए ।  बस इसे सिर्फ़ सूचना समझा जाये और कुछ नहीं । )

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