इधर

अगर मैं चित्रकार होता, तब अभी तक चाँद को घेरे हुए बादलों को दर्ज़ कर चुका होता। वह छितरे हुए हैं मगर चाँद छिप सा गया है। आसमान में रौशनी छनछन कर इस तरफ़ आ रही है। यह फ्रेम मुझे अपनी तरफ़ खींच रहा है। क्या मैं भी कभी किसी को इसी तरह नज़र आता होऊंगा? मुझसे रौशनी आर-पार नहीं हो सकती। पर कहने के लिए ऐसे ही कह जाता। सितंबर की इन गरम होती रातों में इस मौसम को हमें इसी तरह लिखे जाने की कोशिश करनी चाहिए। इन कोशिशों में जो ब्योरे इकट्ठा होंगे, उन सबको मैं कभी ऐसी ही किसी रात को पढ़ जाऊँगा। जब मुझे पता नहीं चलेगा, बाबा पिछले हफ़्ते किसी दिन पिछवाड़े जाते हुए गिर गए। जहाँ गिरे हैं, वहाँ से कोई नहीं बताता, कितनी चोट लगी है। इसी गिरने के बाद उनकी भूख शायद कहीं चली गयी है। तीन दिन तक वह खाना नहीं खाते हैं। यह बादलों के उन बिखरे टुकड़ों की तरह हैं। इनमें कोई क्रम नहीं है। बेज़ार होना इसी को कहा गया है। दिल में कई बातें एक साथ अखर रही हैं। उनका अखरना काँटों की तरह चुभ रहा है। कितनी बातों को यहाँ कहा जा सकता है, उससे ज़्यादा ज़रूरी सवाल है, कितनी बातों को यहाँ नहीं कहा जा सकता। कहने के लिए लबादों की ज़रूरत होगी। भाषा को लबादा बनाया जा सकता है। हम अतीत में ऐसे ही कहते रहे हैं। तुम्हारा यहाँ न होना। मेरे यहाँ बेजान से दिन। उनका उतनी ही बेजान रातों में तब्दील होते जाना। मेरी सारी कोमलतम अभिव्यक्तियों का मेरे अंदर झुलस जाना। 

इधर अपने अंदर वाष्पीकरण की प्रक्रिया को भी ठीक से घटित होता हुआ नहीं देख रहा हूँ, जहाँ वह दोबारा मेरे अंदर इन अदेखे बादलों में परिवर्तित हो जाएँ। इनका भाप बनकर उड़ जाना उसी भाषा को प्रकट कर लेना है, जैसा लिखते हुए मैं बचना चाहता हूँ। तुम्हारी गैर मौजूदगी मुझे बिखेर रही है। मेरे टुकड़े-टुकड़े होते जाने के बीच कुछ भी न बोलने की ज़िद ऐसे ही करती गयी है। चुप रह जाता हूँ। कुछ नहीं बोलता। बोलना उसी अनुपात में तुम्हारे अंदर इसे ले जाना है। मैं सच में कई दिनों से इस खटके के इंतज़ार में रहा। लगता रहा जैसे कुछ है जो छूटा जा रहा है। वह छूटना हम दोनों का छूटना था। मैं बस लिख कर उसे यहाँ कह रहा हूँ। तुम उसे न कहते हुए अपने अंदर जज़्ब किए हुए हो।

सालों बीतने के बाद हम कभी जब बूढ़े हो जाएँगे, तब इन दिनों पर लौटते हुए देखेंगे, हम दोनों के पास यह बीतते दिन किन स्मृतियों की तरह बचे रह गए हैं? अगर यह दिन हम दोनों में यह बचे रह जाएँगे, तब हम समझ लेंगे,  आज इन गुज़र रहे दिनों में हमने जो निर्णय लिए वह हमें नहीं लेने चाहिए थे। इसके अलावे हम दोनों कुछ नहीं कर पाएंगे। इन दिनों में वापस लौट कर इन्हें ठीक करने जैसा तो बिलकुल भी नहीं।

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