दोनों

जबसे लौटा हूँ, तुम दोनों पर लिखना टाल रहा हूँ। पता नहीं ऐसा क्या कह देना चाहता हूँ, जो कहा नहीं जा रहा? कोई बहुत बड़ी बात नहीं होगी । बहुत सारी छोटी-छोटी बातें होंगी । वह उस गाँव की तरह ठहरी होंगी, जहाँ इन दिनों तुम रह रहे हो । उसे उदासी नहीं कहूँगा । वह उदासी के करीब तो है, पर उदास नहीं है । वह एकांत जैसा कुछ है । तुम जब बाहर होते हो, तब वह घर के अंदर ही नहीं अपने अंदर उन सवालों को ढूँढ रही होती हैं । मैं इन अंदर जाती साँसों को पहले इतना नहीं महसूस कर पाता । जब अकेला था, तब तो बिलकुल भी नहीं । जब हम दो हुए तब मुझे समझ आया, जितना हम दोनों बाहर दिखते हैं, उससे अनुपात में कई गुना अपने अंदर खुद को बुन रहे होते हैं । इसमें धागा न चिटक जाए, इसका ध्यान रखना होता है । बहरहाल ।

कोई एक-दूसरे में कितना डूब सकता है, यह पहली बार मैंने अपने इतनी पास देखा । इसे तुम्हारे शादी के साल तो बिलकुल भी महसूस नहीं कर सकता था । यह भी एक गुण है । धीरे-धीरे हमारे अंदर विकसित होता है । वक़्त लगता है । पर हो जाता है । मेरे मन में तो था, इस बार हमारी न हो पायी बातों पर लिखता । पर नहीं । जब तुम घर पर नहीं थे । हमने ख़ूब ख़ूब बातें की । मेरे मन में कई धारणायें थीं, वह धीरे-धीरे टूट रही थी । यह पुरुष होने का एकाधिकार नहीं पर उनमें कुछ ऐसा ही था । अपने मित्र के दिल्ली से चले जाने के बाद कई सारी बातें मन में चला करती । उन्हें तुमसे भी कभी नहीं कहा । पर उनमें इतनी परतें होंगी, कभी सोचा नहीं था । यह जो दबाव तुम्हें लगता है, अकेले सह रहे हो, अगर वह नहीं होतीं तो तुम कुछ भी नहीं कर पाते । यह मेरे अंदर तुम्हारी छवि के दरकने जैसा बिलकुल नहीं है । मैं बस उसे देख पा रहा था, जो कभी मेरी आँखों के पास नहीं गुज़रा । इसे फ्लैश बैक जैसा कुछ नहीं कहूँगा । यह उन दृश्यों, भावों, अनुभूतियों का पुनर्सृजन था ।

मैंने कभी इन्हें सीधे नहीं बताया पर यह दोनों मेरे लिए हमेशा से उस छाया की तरह हैं, जिनमें अपने दुखों के साथ छिप सकता हूँ ।  फ़िर मुझे लगता है, इधर मेरे दुख कुछ बढ़ गए हैं । उन्हें अपने अंदर ढो रहा हूँ । इसलिए भी दिल्ली से चला आया । वह दिन मेरे अंदर दो लोगों के उतरने और हर हालत में साथ रहने की याद की तरह हैं । यह जो साथ होना है, यही मैं तुमसे सीखना चाहता हूँ । मैं कोई बहुत हिम्मती आदमी नहीं हूँ । तुम दोनों की तरह तो बिलकुल भी नहीं । बस थोड़ा-सा सीख रहा हूँ । सीख रहा हूँ, एक शहर में अपनी शर्तों के साथ रहना । साथ खुश होना । साथ दुखी होना । झगड़ने को कभी बुरा नहीं मानता । वह पुराने दिनों में लौट जाने की ज़िद की तरह हैं । हम यह झगड़े आमने-सामने नहीं करते । फ़ोन पर करते हैं । हमारे पुराने दिन ज़्यादा से ज़्यादा पाँच साल पीछे जाएँगे । तबसे हम आपस में घुल रहे हैं । एक दूसरे को सुन रहे हैं ।

दोनों का साथ सत्रह साल का है । जब मैंने यह सुना, तब लगा हमारी दोस्ती से यह दोस्ती कम से कम नौ साल बड़ी है । तब अपने अंदर कई सारी बातें एक साथ टूटने-जुडने लगीं । इनका मन में ऐसे होना कई सारे तफ़सरों के साथ खुलता रहा । भले हम तुमसे मिलते थे, अपने दोस्त को किन्हीं जिरहों में उलझता हुआ देखते थे, लेकिन लगा तुम्हारे बनने में तुम्हारे व्यक्तित्व में वह भी उतनी शामिल रहीं, जिन्हें अपकी स्मृतियों में पीछे लौटने की यादों में वह बता रही थीं । वह एक दोस्त को दूसरे दोस्त की नज़र से समझना भर नहीं, उससे कुछ हद पार कर देखने जैसा अनुभव है ।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

बेतरतीब

आबू रोड, 2007

हंस में आना

शहतूत आ गए हैं: मेरी पहली किताब

हिंदी छापेखाने की दुनिया

जगह

वापसी