वह कमरा घर था हमारा

मैं पिछले कई दिनों से बार-बार उस कमरे में जा रहा हूँ, जो बचपन से हमारा घर था. इसे कमरा बोलना भी एक तरह से अपने अन्दर दूरी को उगने देना है. उस कमरे की सब पुरानी चीज़ें एक-एक कर किसी काम की नहीं रह गयीं. अब वहाँ हमारे वक़्त की कोई भी पहचान नहीं है. उन्हें वहाँ से हटाया जाने लगा है. हर दिन वहाँ कुछ न कुछ नया हो रहा है. नया पुराने को हटाकर ही आएगा, ऐसा नहीं है, पर इन दीवारों के बीच यह ऐसा ही है. इसमें एक तरह की यांत्रिकता है, जिसे वह पहले रहने वाले लोगों के साथ किसी तरह का सम्बन्ध बनाये नहीं रहने दे सकते. अगर वह पिछले की पुनरावृति होगा, तब उन चिन्हों से दावे निर्मित होंगे.  कोई नहीं चाहता ऐसा हो. कोई भी नहीं.

जब तक हम थे, याद नहीं आता पिछली बार जब यहाँ सफ़ेदी हुई थी, हम कितने छोटे थे. एक धुंधली सी याद में हम बस्ता टाँगे स्कूल से लौटे हैं और देख रहे हैं, सारा सामान एक खाली कमरे में रख दिया गया है. उस चूने की गंध फिर कभी नहीं आई. धीरे-धीरे पहले इन्हीं दीवारों में ऊपर छत से सीलन आई और एक वक़्त ऐसा आया, जब वहाँ दीमक ने झरते पलस्तर पर धमक के साथ वहाँ अपना घर बना लिया. हम सबका गर्दन ऊपर उठाकर ऊँट की तरह उस तरफ देखना, किसी मॉडर्न आर्ट गैलरी में टंगे कैनवस को देखने जैसा अनुभव देता. सीलन में कोई महक नहीं थी. उसमें सागर की लहरे थीं और उनके जाने के बाद उठने वाला झाग था. सीपें कहीं नहीं दिखी. पर उनमें हलचल हमेशा बनी रहती.

फिर जिसे हम अपने शब्दों में एक व्यवस्था कहते हैं, उन ढर्रों पर चलने लगते हैं, वह दूसरे के लिए भी वही एहसास दे, ऐसा नहीं है. हम जब तक वहाँ थे, दो अलमारियों में अपना सारा सामन समेटने की कोशिश में लगे रहे. इसे असल में जद्दोजहद ही कहा जाना चाहिए. लेकिन हम मिलकर भी इससे कभी बाहर नहीं आ पाए. सारा घर सामान से भरा दिखता. अगर कोई बाहर से आता, वह जिधर देखता, उसे एक अजीब किस्म का बिखराव नज़र आता. किचन बाथरूम में दाखिल होने को होता. बैठक लगता किचन में लग गयी हो जैसे. वहीं हम टीवी देख रहे हैं, थोड़ी देर बाद खाना उसी फर्श पर बैठकर खा रहे हैं. खाली वक़्त में पंखे के बुढ़ापे के किस्से दोहरा रहे हैं. रात होते-होते यह सारे अतिक्रमण इस कमरे के बैडरूम में बदलते ही ख़त्म हो जाते. कमरे की यह अराजकता हम सबके व्यवहार में कितनी है, पता नहीं. वैसे इसे कभी मापने की कोशिश नहीं की है.

शायद इसका एक असर यह हुआ, हम अपनी कल्पना में भी दोबारा इस तरह किसी कमरे का स्वरुप नहीं चाहते. लेकिन क्या करें, इस नए वाले कमरे में भी अभी तक बिखरा हुआ सामान किसी तरह की बैचनी पैदा करने में नाकाम रहा है. सब कई कई दिनों तक ऐसे ही जहाँ-तहाँ फैला रह सकता है. हमें कोई फर्क नहीं पड़ेगा. सब तो जैसे पीछे छूट गया है. पंखा, दरी, कुर्सियाँ, वह दिवार में चुनी हुई अलमारी. सब साथ ले आते पर हमारे बस में नहीं था. हम खुद खुद के बस में नहीं हैं.

कितनी ही स्मृतियाँ अभी भी उन दीवारों के बीच रह गयी हैं. हमारा बचपन सारा वहीं छूट गया है जैसे. हर साल उन्हीं महीनों की यादें. गाँव जाकर इस घर में वापस लौटने की इच्छा. सब बिन खिड़की वाले कमरे में रह गया. यह जो अब वहाँ की दीवारें कुछ नहीं कह रही हैं, हम सबको अन्दर से कुछ और खाली कर रही होंगी. पापा-मम्मी चाहते होंगे उन यादों में कुछ देर वापस लौट जाएँ. हम भी लौट जाना चाहते हैं. अभी बीते इतवार पैर में दर्द होने के बावजूद मम्मी नीचे उस कमरे को देख आई हैं. पापा भी वक़्त लगे उसे देख आते हैं. लेकिन हम चाहकर भी उसमें वापस फिर समां नहीं पायेंगे.

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

बेतरतीब

आबू रोड, 2007

हंस में आना

शहतूत आ गए हैं: मेरी पहली किताब

हिंदी छापेखाने की दुनिया

जगह

वापसी