याद दोपहर

अगर हम लिखना छोड़ दें, तब ऐसा नहीं होता कि हमने लिखना छोड़ दिया. होता बिलकुल इसके उलट है. लिखना हमें छोड़ देता है. मैं इस गरम होते शहर में छत पर एक कमरे में खिड़की पर परदा डालकर बैठा हुआ हूँ. बाहर आग उगलती हवाएं चल रही हैं. मेरे दिमाग में बहुत सी बातें चल रही हैं, पर उनमें से किसी को भी लिख नहीं पा रहा. बिस्तर इतना गरम है, जैसे अभी कुछ देर पहले कंक्रीट की छत अपने आप हट गयी हो और इसे भी अपनी चपेट में ले लिया हो. मेरी मेज़ पर आदतन बहुत सी किताबें बिन पढ़ी पड़ी हुई हैं. पढ़ने का मन बहुत सालों बाद इस तरह होता देख खुद को तैयार करने लगा जैसे. एक पैंसिल उठाई. कागज़ पर नज़र गयी. कुछ नोट कर लेने का मन हो गया, तब क्या करूँगा? दिवार से टेक लगता, इससे अच्छा होता मेज़ पर ही तकिया इस तरह रखता कि पीठ भी जल्दी नहीं दुखती. पर कौन सी किताब पढ़नी चाहिए? अनुवाद बहुत रखे हैं. अंग्रेजी से हिंदी. रामचंद्र गुहा, मार्क ब्लाख़, रोमिला थापर, अरुंधती रॉय. निवेदिता मेनन, लाओत्से. कौन सी? एक किताब फेनन की भी है. समझ नहीं आ रहा. सब आपस में गुत्थम गुत्था हो रही हैं. उठा किसी किताब को नहीं रहा हूँ. बस दूर से देखे जा रहा हूँ. किसे पढ़कर लगेगा, कुछ पढ़ा है?

मन में पता नहीं कैसे उस लेखिका के बारे में सोचता रहा, जो साल भर से लन्दन या ऐसे किसी सुरक्षित देश में एक कमरे में बंद होकर अपने आने वाले उपन्यास को पूरा कर रही है. मैं कभी साल भर उस होटल का कमरे में बंद रह पाऊंगा? इस पर पहुँचा ही नहीं, मैं बस किराये में उलझ कर रह गया. कितना होगा एक दिन का किराया? यह किताब जो आने वाली है, उसे बेचकर वह इस किराए को चुका पाएंगी? कितनी बिकेगी किताब? यह सवाल बाकी सवालों की तरह सुलझ ही नहीं पाया. मैंने जिद करके 'ब्रोकन रिपब्लिक' उठाई और उसका दूसरा रिपोर्ताज पढ़ने लगा. 'वॉकिंग विद दी कॉमरेड्स' पेज नंबर पच्चीस.

पढ़ना शुरू ही किया था कि मन तारीख में अटक गया. हमारी ट्रेन पिछले साल आज की तारीख शाम छह बजे सिकंदराबाद पहुँच चुकी थी. उसे आधे घंटे बाद वहाँ होना था. आज सुबह पातालकोट का टिकट कैंसिल करवाया है. जहाँ जा रहा था, वहाँ कोई नहीं था, इसलिए जाना बेकार था. सोचा था, नागपुर उतर जाता. पर यह तो आमला से ही कहीं और चल पड़ती है. वह बीच में कहीं नहीं पड़ता. मन ऐसे ही ख्यालों में उड़ता रहा. पर एक शब्द नहीं लिखा. तब लिख लिया होता तो अभी रात के साढ़े ग्यारह बजे यहाँ बैठा नहीं होता. कुछ और काम कर रहा होता. शायद उस सूरज के ख्यालों में डूब जाता. उस दिवार के पास खड़े होकर उस दिशा को देखता जहाँ सुबह सात बजे ही वह पेड़ों को चीरता दरवाज़े पर खड़ा मिलता है. वह हिसाब लगाकर अपनी डायरी में लिखता होगा, आज बहुत तप लिया. अब थोड़ा आराम करने देता हूँ. बेचारे हैं. बचकर जायेंगे कहाँ?

इन रातों को नींद वैसे ही नहीं आ रही है. अभी अखबार में पढ़ा, तब पता लगा, मैं अकेला नहीं हूँ. यह सिर्फ मेरे साथ नहीं हो रहा. मेरे जैसे कई हैं, जो ठीक से सो नहीं पा रहे हैं. मौसम कुछ इस तरह करवट ले रहा है, जिसमें हमारे नींद के पैट्रन बिलकुल बदल गए हैं. नींद नींद के वक़्त नहीं आती. उसके टलते जाने में ऐसा वक़्त आता है, जब उसे सबसे ज्यादा नहीं आना चाहिए, वह तभी आती है. हम चारों तरफ मशीनों से घिरे हुए हैं. उन्हीं में दिन रात उलझे हुए हमारे तार सुलझ नहीं पाते. पर मुझे पता है मैं तभी सुलझ पाऊंगा, जब तुम वहां से चल दोगी. तुम नहीं होती, तो लगता है, जैसे सब थम सा गया है. वहीं का वहीं रुक गया है, जहाँ हमने उसे छोड़ा था. कभी-कभी तो लगता है, अभी नीचे से खाना खाने के लिए तुम आवाज़ दोगी और मैं 'अभी आता हूँ' कहता हुआ तेज़ी से सीढ़ियों की तरफ भागूँगा. पर अगले ही पल ख्यालों से बाहर आता हूँ और पाता हूँ, अब वह सीढ़ियाँ कहीं नहीं हैं. जहाँ से तुम मेरी पीठ की तरफ़ पड़ने वाली खिड़की की ओर ऊपर देखकर पुकारती थी, वह छत भी कहीं नहीं है. वह कमरा अब छूट गया है. इस कमरे पर आकर मैं थोड़ी देर रुकना चाहता हूँ. रूककर कल रात डायरी में लिखा हुआ याद कर लेना चाहता हूँ. जब तक याद कर रहा हूँ, तुम वहां से चल पड़ो. शायद याद आते-आते तुम यहाँ तक पहुँच जाओ. पर जब तक उस कमरे को अपने अन्दर उतार नहीं लेता, तब तक आगे नहीं लिखुंगा.एक शब्द भी नहीं.

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