लिखना

इसकी कोई वजह नहीं मिल रही. लिखना कम क्यों हो गया? शायद ऐसा सबके साथ होता होगा. हमारी आदत से काफ़ी चीजें निकलती रहती हैं. हम ताप महसूस करें, तब भी होता है, लिखा नहीं जाता. मन कहीं और भागने को होता है. जैसे कभी कमरे से बाहर होकर वापस आने के लिए हम जाते हैं, वैसे ही लगता है, न लिखते हुए लिखने की तरफ लौटना चाहता हूँ. यह चाहना एक इच्छा है. छोटी सी इच्छा. जिसे पूरा करने के लिए कोई भी ऐसा काम नहीं कर रहा, जिससे यह लौटना हो पाए. कागज़ पर थोड़ा बहुत कहता रहा हूँ पर उसे यहाँ नहीं लगा सकता. यह डर नहीं है. यह डर से पहले का कुछ है. इसे संकोच भी कह सकते हैं. संकोच एक बेहतर शब्द है. पर इस्तेमाल नहीं करना चाहता. यह शायद अब मेरी बातों में ऐसा इकहरापन है, जो मुझे घेरे हुए है. ब्लॉग स्क्रोल करते हुए उसने कह दिया, यहाँ क्या लिखा हुआ है? जैसे लगता है, सब दुःख से ढक गया हो. दुःख का स्थायी भाव मेरे अन्दर मानसून की हवाओं की तरह नहीं है. असल में उसका कोई मौसम ही नहीं है. हम सब ऐसे ही होते रहते हैं. कोई कम, कोई ज्यादा. मेरे हिस्से यह ऐसा ही है. बेकार. बेतरतीब. बेवजह.

शायद मेरे अन्दर लिखने को लेकर इमानदारी भी कम हुई है. मुझे लगता है, सब बातें लिखी तो जा सकती है पर उन्हें लिखने का मन कहाँ से लाऊं? यह लाना जहाँ से भी होगा, लगता है, टलता जा रहा है. इसमें जितनी देर होती जायेगी, उसका नुक्सान उन पढ़ने वालों को होगा या नहीं, कह नहीं सकता. पर उन साथियों को, जो साथ लिखते थे, उनकी वजह से मुझे ज़रूर हो रहा है. वह सब ज़िन्दगी के नए पन्नों पर बिन कलम चल पड़े हैं. उनका मन अब लिखने को नहीं होता होगा, यह उनके दिन की धड़कनों को सुनने के बाद पता चलेगा. मेरी धड़कनों में एक ऐसा दिन है, जब मेरा आधा शरीर बिलकुल थम गया है. मैं चल नहीं पा रहा हूँ. जहाँ बैठा हूँ, वहीं बैठा रह गया हूँ. खून जहाँ था, वहीं जम गया हो जैसे. मेरी कल्पनाओं में यह दिन ज़्यादा दूर नहीं है. असल में इन दिनों ऐसा ही हो गया हूँ. मेरे दिल वाली तरफ़ अब खून नहीं बहता. दिल नहीं धड़कता. उतना खून बह रहा है, जितने से जिंदा रहा जा सकता है. उतनी ही हरारत बची है, जिसे जिंदा रहने का सबूत माना जाता है. बाक़ी दिखे जो भी जो मैं कह रहा हूँ, उसे मानना कोई नहीं चाहता. कभी-कभी हम देखते हुए भी मानना नहीं चाहते.

इस न लिख पाने की वजह से अजीब सी रस्साकशी में फंस कर रह गया हूँ. दोनों तरफ़ मैं ही हूँ. एक लिख रहा है और दूसरा नहीं लिख रहा है. ऐसा नहीं है, कहने को कुछ बचा नहीं है. मैं मूलतः खुद को लिखकर, कह कर खाली करने वालों में गिनता हूँ. पर न इधर लिखने वाली स्याही कहीं है, न उन सुनने वाले कानों का कहीं अता पता चल रहा है. यह दोनों मेरे अंदर उस वक़्त उग आते थे, और मेरे अन्दर ही बहने लगते, जब मुझे उनकी सबसे ज्यादा ज़रूरत होती. यह इसलिए भी ऐसा हुआ होगा क्योंकि मैंने लिखने को लेकर जिद करना छोड़ दिया है. मैं अब ख़ुद को उस तरह अड़ियल खच्चर में तब्दील भी तो नहीं करता, जो सोने से पहले, भारी होती पलकों में भी लिखने के लिए बैठ जाया करता. अब तो कुल मिलाकर एक ही काम बचा है. सोना. जब भी वक़्त मिलता है, पीठ को सीधा करने की गरज़ से लेट जाते हैं. मेरा लिखना भी शायद यही सोचकर लेट गया है.

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