तुमसे चुराई घड़ी..

हमें एक हफ़्ते पहले ही उस देश की नागरिकता मिली है। आज हम दोनों चाँद पर हैं। नासा ने हमें वहाँ अपने पैसे पर भेजा है। हम चाँद पर पहुँच गए हैं, फ़िर भी नागरिक हैं। उसने इस बार रॉकेट पर पैसे ख़र्च नहीं किए। एफ़-सोलह लड़ाकू विमान पंद्रह मिनट पहले हमें छोड़ गया है। सबसे पहले हमने पहला कदम रखा और दूसरे से पहले ही भागकर इस स्टूडिओ आकर तस्वीर खिंचवाने दौड़ पड़े। वह भी हमें देखकर हैरान हैं। हम वहाँ कैसे? गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी से हम दोनों की ज़ेबों में थोड़ा-सा छिप कर आ गया और यहाँ बसंत पृथ्वी पर आने के आठ दस दिन बाद हवा की तरह बिखर गया है। हम हैरान इस बात पर नहीं हैं। बल्कि हम तो यह सोच रहे हैं कि कैसे इस मिट्टी में गोले के तेल की महक घुल गयी है? हमने हवा से, उस घूमते आसमान से, ठहरी हवा से, वहाँ गायब हो चुकी नमी से और न जाने किस-किस से पूछा, कोई नहीं बता पाया। यह क्या है?

मैंने भी तुम्हारी तरह अब दिमाग लगाना अब छोड़ दिया है और मैं खो गया हूँ कि कैसे अब अपने दिल को संभाल कर हलक से नीचे धकेल दूँ। दिमाग में तो बस यही एक ख़याल है। मेरा चाँद तो तुम हो। मैं तुम तक पहुँचना चाहता हूँ। अब दो-दो चाँद हो गए इसलिए पाशोपेश में हूँ, अब क्या करूँ? कायदे से मुझे तुम्हारे साथ अपनी पृथ्वी पर वापस आ जाना चाहिए। अपनी जमीन पर लोटते हुए उन नरम मैदानों में उतनी ही मुलायम घास चरती गाय किस तरह अपनी पूंछ उठाकर गोबर करती होगी? मैं वहीं अपने सिर को बिलकुल उसी क्षण ले जाकर उस गंध से भर जाता और बकरियों की लेड़ियों से उसकी तुलना करने लग जाता। तुम मेरी इस कल्पना में एक बुकमार्क की तरह आती और हम सपनों के इस सुनहरे मैदान में गुलाबी आकाश में चमकते सितारों में कहीं खो जाते।

खो कर भी हम घर पहुँच जाते। पहुँच कर तुम वहीं घर की दीवारों को मिट्टी के कण्डों को बनाने से पहले मेरे सिर में से टपकते गोबर को लोटे में इकट्ठा करती। इकट्ठा करके उनमें थोड़ी चिकनी मिट्टी डालकर और मुलायम करती जाती। ऐसा तुम करती और मेरे घर के सपने में हर बार यही घर आता। नींद में नहीं कहीं बैठे-बैठे किसी ख़याल में खो जाने के बाद। जैसे अभी मेट्रो के डिब्बे में बढ़ गयी भीड़ में उन नाज़ुक हाथों को किसी सख़्त पकड़ में जकड़े हुए देख, किसी खिड़की के बाहर भीख माँगते खुरदरे स्पर्श में इतिहास की उस बारीक लिखावट में वह आँसू में भीगे खून से लथपथ क्षण रख दिये गए होंगे। मुझे समझ नहीं आता, अपने प्रेम को किस तरह पुराने घिसे पिटे प्रतीकों, बिंबों, छवियों, एहसासों, क्षणों से बाहर निकाल पाया हूँ। पर यह उलझना मेरे सौंदर्यशास्त्र को नए सिरे से गढ़ रहा है। यह बात कैलेंडर में किसी तारीख़ की तरह छप जाएँगी। छपना छाप की तरह है, हिना के सूखने से पहले गीले पलों में बिखरने के ख़तरों को लिए हुए। ख़तरा लाल रंग से नहीं बेरंग होकर हमारे अंदर समा जाता होगा।

तुम सोच रही होगी, किस तरह तुम मुझे समझ सकती हो? तो मेरी जान..!! इतना आसान नहीं है हर किसी का एक बार में समझ आना। समझी। के बताऊँ? चलो जाने देते हैं। फ़िर कभी शाम को बैठेंगे। तब पूछना।

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