आज की तारीख, उनतीस फरवरी

आज उनतीस फरवरी है। यह दिन भी और दिनों की तरफ बीत रहा है। इसमें ऐसा कुछ भी खास नहीं है, जिससे कल और आज में कुछ मूलभूत अंतर दिख रहा हो। बस एक तारीख है, जो चार साल में एक बार आती है। कल से ही इस दिन की पिछली किश्तों में वापस लौट रहा था। कोई भी याद ऐसी नहीं जिसे कभी याद किया हो। चार साल पहले भी पढ़ रहा था आज भी पढ़ रहा हूँ। दुनिया न तब बेहतर थी न उससे पहले। यह दुनिया हम जैसे नकारा लोगों से भरती रही है। हद दर्जे के आलसी हैं। बस खुद को पहचानने में देर बहुत कर देते हैं, और कुछ नहीं। मैंने भी सोचा आज कुछ अलग 'फ़ील' करूँ। जैसे सब करने की करते हैं। कोशिश करके भी नहीं कर पा रहा। कुछ अलग-सा हो तो करूँ न। जब कुछ नहीं होता, तब ऐसे ही बैठा होता हूँ। मौसम गरम होता जा रहा है। पीपल के पत्ते पैरों में चमरौन्धे जूते का एहसास दिला रहे हैं। सुबह की ठंड शाम तक आते-आते दोबारा गुलाबी होने की कोशिश में लगी रहती है, पर हो नहीं पाती। रात होगी, और पहर बीतते-बीतते कुछ रजाई के हट जाने से हवा लगने तक पता ही नहीं चलता।

सोच रहा हूँ आज के दिन में क्या खास है, जिसे दुनिया अपने पास रख लेना चाहती है। उन्नीस सौ चार में जन्मी नृत्यांगना रुकमणि देवी का आज एक सौ बारहवाँ जन्मदिन है। जिसपर आज गूगल ने अपना डूडल बनाया है। आबिद सुरती बंबई में अस्सी साल की उमर में भी पानी की एक-एक बूंद बचाने के लिए कोशिश कर रहे हैं। लोगों को आने वाले कल के लिए सचेत कर रहे हैं। लियनार्दो को आज रेवनेंट के लिए अकेडमी अवार्ड मिला। जिस मंच पर वह उस ट्रॉफी के साथ हम सबसे इस पृथ्वी की बात कर थे, क्या उन्हें अपनी उम्र से दुगने आदमी के बारे में खयाल आया होगा? ऐसा क्यों हुआ कि दुनिया के दो हिस्सों में एक ही तरह के ख़याल अलग-अलग रूपों में नज़र आते हैं। 

इतिहास में और कौन-सी ऐसी घटनायें हैं(?) जिन्हें वह याद बनाकर रख लेगा? अरुण जेटली का किसानों के लिए इस बजट में विशेष ध्यान और ग्रामीण भारत के दबावों को महसूस करता वित्त मंत्री? बीएस बस्सी की सेवा निवृत्ति का दिन। पता नहीं और क्या-क्या इस दुनिया में इसी वक़्त घटित हो रहा है। डॉनल्ड ट्रम्प की अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में दावेदारी को लियनार्दो किस तरह से देखते होंगे? पर्यावरण के साथ-साथ उनके मन में और क्या बातें चल रही होंगी? क्या उन्हें हरियाणा में जाट आरक्षण के लिए किए गए आंदोलन की कोई ख़बर है? क्यों मेरे प्रस्थान बिन्दुओं में बार-बार अमेरिका का ज़िक्र आ रहा है। कौन होगा, जो कभी इसका मनोविश्लेषण करते हुए इसकी परतों में जाकर कोई नयी बात कह देगा। क्यों मैं कल देखे उस वीडियो की बात यहाँ नहीं कर रहा। जिसमें घर-घर खेलते हुए लड़का-लड़की अपनी अपनी लिंग भूमिकाओं के लिए तय्यार हो रहे थे और आज उनके पिता उन दिनों के लिए खुद को दोषी बता रहे थे। क्यों उस व्यक्ति के बारे में कुछ नहीं कह रहा, जिसने एरियल के लिए इस तरह सोचते हुए इसे  बनाया। कोई लड़की ही होगी, ऐसा मानने का मन नहीं कर रहा। हो सका, तो एक दिन उससे मिलुंगा और पूछूंगा। क्यों जी, घर-घर खेलते-खेलते और क्या हुआ था, जिसे तुम अभी भी कहना चाहते हो?

कोई याद रखेगा हम सिर्फ़ दो ही रंग देखने के आदी हो गए हैं? कौन कहेगा हम वही लोग हैं, जिनके यहाँ आठ पहर हुआ करते थे, लेकिन आज हमें दिन और रात ही समझ आते हैं। आज या तो हम देशभक्त हो सकते हैं या कन्हैया, उमर खालिद, अनिर्बान की तरह देशद्रोही। बीच की सारी श्रेणियाँ हम अपने इतिहास में हजम कर गए। बस यह दिन बचा रह गया। जिसे हम सब अपने-अपने तरीकों से उतार रहे हैं। जूझ रहे हैं। खीज रहे हैं।

हर दिन की तरह इस दिन की ख़ास बात है, कुछ नहीं भी कुछ करेंगे तो भी यह बीत जाएगा।

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