उँगलियाँ नाखून नहीं होती

पता नहीं यह क्या है, यह इस हफ़्ते तीसरी या चौथी बार है। हर बार अपने आप को किन्हीं और लोगों में उनके जितना महसूस करने लगा जैसे। शायद यह इंसान बनने की प्रक्रिया में अगला कदम है या कुछ और..? कह नहीं सकता। न ही इसका कोई दावा मेरे पास है। बस, पता नहीं क्यों उनके दुखों में हिस्सेदार बन जाना चाहता हूँ। फ़िर भी, यह जैसा है, उसे कह देना चाहता हूँ। यह जो महसूस कर रहा हूँ, आप को भी करवा पाऊँ। पर देखते हैं कितना..

सोमवार। एक कमरा। दरवाजे पर कुंडी लगी हुई है। दरवाजा बंद है। उसपर एक चिट चिपकी हुई है। लिखा है, 'रिकवरी रूम'। उसी चिट में उनका नाम देखकर हम थम गए। हम दोनों के मन में पता नहीं किन-किन अनिष्टों की कल्पना बिजली की तरह कौंध गयी। पर हम दोनों ने बड़ी चालाकी से यह बात आपस में नहीं बताई। चुप थे, थोड़ा और चुप होकर, सहम गए। दोनों ने सहमति से 'रिसेप्शन' पर वापस लौटकर सही और पूरी जानकारी लेने का मन बनाया। हम सीढ़ी से उतर रहे थे। मानो हमारा दिल गहरे अँधेरे तल में डूबता जा रहा था। हम चीखना चाहते, पर चीख नहीं पाये।

नीचे 'रिसेप्शन' पर बैठी वह लड़की नहीं जानती होगी, इन दिनों जेएनयू में क्या हो रहा है। वह तो यह भी नहीं जानती होगी, जिनके बारे में अभी हम उससे पूछने जा रहे हैं, उनके साथ क्या हुआ है। वह फ़ोन मिलकर किसी से बात करती है और हमें बस इतना कहती है, 'वे ड्रेसिंग करवाने गए हैं, करीब आधे घंटे में लौट आयेंगे'।

हम चुप हैं। कमरे में अजीब-सी बेचैनी है। गैंग्रीन, जिसे अपनी ज़िन्दगी में अज्ञेय की कहानी से जानते आए, उसे पहली बार इतनी पास घटित होते देखा। कैसे बजबजाती खाल को डॉक्टर पैर सुन्न कर चार उँगलियाँ काट ले गए। ख़ून से संक्रमण पूरे शरीर में फैल जाता, इसके लिए उन्होने पैर को पैर न रहने दिया। पैर जिन्हें उनकी माँ ने कितने प्यार से बचपन में सहलाया होगा। कितनी बार यूनानी तेल की मालिश की होगी। उन पर मोहते हुए, चूमती होंगी। वहाँ अब सिर्फ़ अँगूठा बचा है। सिर्फ़ अँगूठा। हम बस किसी तरह से उस कमरे से भाग आना चाहते थे। जिनके पैर की अंगुलियाँ अब नहीं हैं, उन्हें दर्द भी महसूस नहीं हो रहा। उनका दर्द उनके पास रह भी कहाँ गया। वह अब चलेंगे, तब उनका पैर पैर नहीं रह जाएगा। पता नहीं उसे पैर कहेंगे भी या नहीं। वह नाखून नहीं हैं कि उग आएँगी। पता नहीं इन बीते दिनों में उन्हें कभी दर्द महसूस हुआ भी होगा या दवाई उस उस दर्द को कहीं और ले गयी होगी।

पता नहीं कल रात से कैसा हो गया हूँ। उन्हें कुरेदना नहीं चाहिए था। दर्द जो अंदर था, दोबारा सतह पर आ गया। सच, अब नहीं लिखा जाता। डॉक्टर ने उन्हें बाहर का कुछ भी खाने से मना किया है। रोटी भी नहीं खा रहे। खिचड़ी खा रहे थे। वे कहते रहे, तुम दोनों को ही खाने हैं। कमरे में अंगूर की थैली वैसी की वैसी पड़ी रह गयी।

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