सिक्के जो चलते नहीं

कहने को बहुत-सी बातें हैं, जो कहते-कहते हम नहीं कह पाते। उनका कहा जाना ज़रूरी है, इसलिए बार-बार इसके बहाने बनाए जाने चाहिए। लेकिन आज जो बात कहने जा रहा हूँ, उसमें कोई नयी बात नहीं है। इधर हम दूरदर्शन के दौर में वापस आ गए हैं। केबल वाला अपनी मनमर्ज़ी करने की हद पर था जब हमने उसके सेट बॉक्स को हटवाने का फ़ैसला लिया। साल ऐसे ही शुरू हुआ था। बिन टीवी के। इकतीस दिसंबर से लेकर लगभग एक हफ़्ता टीवी पर कर्फ़्यू। कोई हलचल नहीं। वह सारे धारावाहिक वहीं के वहीं बर्फ़ की तरह जमें रहेंगे। वह सारे दृश्य हमारे मनों में वहीं थम से गए हैं। यह ऐसा दौर है जहाँ इस माध्यम से समाज नेपथ्य में भी नहीं है। पूरा अनुपस्थित है। हम उन पर वापस नहीं लौटेंगे। बस यहाँ एक दिक्कत है, रवीश का एनडीटीवी नहीं आता, उसे कभी-कभी नौ बजे उनके कारण देख लिया करते थे। अब वो भी नही।

पिछले चार-पाँच सालों से टेलीविज़न हमारे लिए सिर्फ़ ख़बर देखने तक सिमट गया था, उसकी जगह फ़ेसबुक लगातार मज़बूत भूमिका में उभर कर आया है। वहाँ हम सब एक-दूसरे के लिए पढ़ते हैं। जो हमें जहाँ से लगता है, उसे शेयर करते हैं। यह साझेदारी हमारे रुझानों, रुचियों, आग्रहों, पूर्वाग्रहों से नियंत्रित होती है। यह विमर्श को पैदा करने, उस पर बात करने का एक ऐसा अवसर है, जिससे हम बच नहीं सकते। अगर बचेंगे, तो उनके ऐसे प्रभावों से नहीं बच पाएंगे, जो इस देश को हमारे सोचने-समझने के तरीकों को अपने मुताबिक ढालना चाहते हैं। यह बात सिर्फ़ देश जैसी स्थूल दिखती संरचना की नहीं है बल्कि उनकी तरलता में बनते हमारे वर्तमान और आने वाले भविष्य की है। यह हमारे स्वादों, जीवनशैलियों, संस्कृतियों, अपने लोक अपने परिवेश को बचाए रखने के लिए ज़रूरी कदम है। हम लोग उन आक्रामक माध्यमों को इस्तेमाल करते हुए सचेत रहना चाहते हैं, जिनसे आज हम घिर गए हैं। 

कुछ जादा हो गया लगता है। ख़ैर। बात मुझे करनी थी, मधुबाला की और कहाँ फँस गया।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

बेतरतीब

आबू रोड, 2007

हंस में आना

शहतूत आ गए हैं: मेरी पहली किताब

हिंदी छापेखाने की दुनिया

जगह

वापसी