डिसलोकेट

आवाज़ें कभी-कभी डिसलोकेट करती हैं। उन सब जगहों से भागते हुए मुझे कभी यही लगता रहा कि परिचित ध्वनियों से बना एक परिवेश ऊब से भी ज़्यादा कोफ़्त देने वाला वितान रचता है। अभी जहां बैठे हुए यह सब लिख रहा हूं, वहां रात के दस बजे कल सुबह के लिए कूकर में आलू उबल रहे हैं। एक सीटी की सुरसुराती हुई आवाज़ किस तरह मेरे कानों में बजती हुई किन दृश्यों तक मुझे ले गई है, बता भी नहीं सकता। उन्हें कहते हुए यह विषय पीछे छूट जाएगा। जो बात यहां रेखांकित करना चाहता हूं, वह पहली पंक्ति के भीतर ही समाप्त हो जानी चाहिए थी, जिसका भाष्य यह व्याख्या कर पाने में अक्षम है।

सोचिए, आप रात के लगभग तीन बजे रजाई उघड़ जाने से लगातार बड़ी देर से लगती ठंड के कारण उठते हैं और तभी कहीं लोहे की दीवार से किसी के बात करने की आवाज़ आती है। यह स्वाभाविक जिज्ञासा मेरे मन में भी थी। कौन इतनी रात गए आपस में बात कर रहा है? जब कुछ देर तक एक ही आवाज आती रही, तब यह पुख्ता हुआ कोई फोन पर दूसरी तरफ़ इसी तरह तड़के तीन बजे जागा हुआ है। जब आप ठंड लगने से कुनमुनाते हुए पेशाब के बहाने अपनी नींद को दोबारा शुरू करने की इच्छा से भरे हुए हैं, तब दो लोग अलग-अलग जगहों पर एक ही समय लगभग जागते हुए बात करने की प्रक्रिया में सहभागी बने हुए हैं। एक मौजूद नहीं है फ़िर भी मौजूद है । उसका न दिख पाना ही दिख जाना है । एक अस्पष्टता है ।

आवाज़ इस तरह मन में किसी तरंग की तरह नहीं उठती। मेरा मन कोई समंदर नहीं है, जो वहां इस तरह वह हमेशा मौजूद रहें। यह खलल ही इस बार मुझे दोबारा घेरे ले रहा है। कोई अनसुना अस्पष्ट वाक्य भी एक तरह यहां पेड़ की तरह जमने नहीं दे रहा। वहां जिस कमरे में सोता हूं, वह इस अर्थ में मेरे मन को ऐसा रखता है, जहां से आकर यह सब अस्त-व्यस्त सा लगता रहा है। वहाँ आवाज़ें इस तरह अतिक्रमण नहीं करती । कान के पास से इस कदर नहीं गुजरती । हो सकता है, अभी भी कई बातों को लिखने से टाल रहा हूं। सीधे नहीं कह रहा। इसका मतलब यह नहीं है कि वह मेरे अंदर टहल नहीं रही हैं। वह अभी भी अन्दर ही अंदर चहल कदमी कर रही हैं। बस उन्हें कहा ही तो नहीं है। न कह पाना ही कह जाना है।

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