इच्छा

पता नहीं क्यों आज लिखने का मन हो गया। यह कुछ ऐसी बात है, जिसे कहे बिना रहा नहीं जा रहा। यह असर की बात है। यह एक इच्छा की तरह मेरे अंदर उभरी है। इसे अगर शब्दों में कहने बैठूँ, तब इसमें सिर्फ़ इतनी सी बात है कि नहीं चाहता मेरा मुझसे बाहर किसी भी पर भी कोई असर पड़े। यह किस तरह का ख़याल है, उससे ज़्यादा ज़रूरी बात है यह एक ख़याल की तरह मेरे अंदर क्यों उग आया? शायद इन दिनों देख रहा हूँ, चाहे-अनचाहे बहुत कुछ ऐसा मेरे बाहर आया है, जिससे नहीं चाहता, कभी वह किसी की बात में ज़िक्र की तरह आए। लगता बात टूट रही है। जिस ताप से एक पल पहले महसूस कर रहा था, अब अनमना होकर कह रहा हूँ। ऐसा नहीं है। यह शायद इंसानी फ़ितरत है या हम ख़ुद किसी न किसी की तरह किन्हीं संदर्भों को अपने आस-पास छोड़ते रहते हैं। यह छोड़ना ख़ुद छूटने जैसा नहीं है। यह अनायास भी नहीं कहा जा सकता। हम लिखकर, कहीं बोलकर, कहीं न बोलते हुए सब कर रहे हैं। मैं तो अपने इर्दगिर्द इसी तरह उलझा हुआ रहता हूँ जैसे किसी मकड़ी के जाले में वह मकड़ी ख़ुद को ही इस कदर उलझा ले जहाँ से उसका निकलना एक दम असंभव हो। जानकार कहते हैं, उसके थूक में यह बात छिपी हुई है। उसे पता है कौन सी परतें चिपचिपी नहीं हैं। अगर वह मेरी ही तरह भूल जाये, तब क्या होगा? शायद मैं भूल ही गया हूँ, इस स्थिति से बाहर निकलने का कौन सा रास्ता है। अपने में ही खोया हुआ व्यक्ति जब अपने आस-पास घूमता है, नहीं घूमता है, फ़िर भी उसके एहसास से कुछ लोग तो भर ही जाते होंगे। 

जब उसे ख़ुद नहीं पता, वह जिन तरहों से ख़ुद को भरता आ रहा है, वह दूसरों को भी कुछ कुछ उसी तरह नज़र आता रहा है। वह लगातार उसे देख रहे हैं। भले वह उन परतों में उसके साथ उतनी गहरायों तक न पहुँच पाएँ, जहाँ साँसें उखेड़ने लगती हैं , फ़िर भी वह इस सफ़र में सारी सावधानियों के बाद भी एक झिलमिलाता हुआ दृश्य बना रहा है। उसका लिखा हुआ हर वाक्य, भाव, भावातिरेक उसके ख़ुद को बचा ले जाने की तरक़ीब है। यही सच उसने कभी नहीं कहा। वह कहता भी है, तो उतना ही, जितना शब्दों में छिप जाये। दिखते हुए छिपे रहना उसकी सबसे बड़ी ख़ूबी है । अब भी क्या आपको मेरी इच्छा में कुछ भी नाजायज़ लग रहा है। अगर नहीं, तब क्यों मुझसे मेरी बन रही छवि से ख़ुद की पुतलियों को भरे ले रहे हैं? हो सकता है, आप अभी इस पल कुछ समझ नहीं पाएँ, इसलिए कह रहा हूँ, जब समझ ही नहीं पा रहे, तब उस असर में घुलने से बेहतर है, दूर चले जाना । कौन किसी को अपनी जैसी किसी नकल में तब्दील होता देखना चाहता है? मैं भी नहीं चाहता। यही मेरी छोटी सी इच्छा है।

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