जगह

क्या किसी भी जगह को हम खाली स्थान की तरह चिन्हित कर सकते हैं ? यदि हाँ तो कब और अगर हम ऐसा नहीं कर सकते तो कब हम ऐसा करने की हैसियत में नहीं होते ? यह सवाल बहुत बड़े हलके में बहस का हिस्सा बना हुआ है । कब, कौन, कहाँ से चलकर किधर आ गया, यह अन्वेषण से अधिक संदेह का विषय बन गया है । यह उस समाजशास्त्रीय प्रश्न की उत्पत्ति भी करता है जिसमें हम किसी स्थान, भाव, स्वाद आदि से निकटता या दूरी बनाना चाहते हैं । यह एक स्वाभाविक प्रक्रिया है । लेकिन सिर्फ़ व्यक्ति के स्तर पर । एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति में कुछ ऐसे बिन्दुओं को जान लेना चाहता है, जिससे वह यह तय कर पाये कि भविष्य में उनके संबंध कैसे रह पाएंगे । यहाँ सवाल यह भी उठता है, इसमें किस प्रकार वह संचालित होता है, यह देखने लायक बात होगी । जैसे ही कोई निश्चित भूगोल को अपने लिए एक सीमा मान कर ख़ुद को एक शासन के अधीन लाता है, वह किसी राज्य की उत्पत्ति या उसके जन्म का बिन्दु हो जाता है । जितनी सरलता से एक पंक्ति पहले राज्य नहीं था और एक ही पंक्ति में कुछ ऐसा घटित हुआ कि भूगोल, सीमांकन, राज्य और शासन प्रणाली का उदय होता हुआ दिखने लगा, वास्तविकता में इन एक एक घटनाओं को होने में बहुत लंबा समय व्यतीत हुआ है । सदियों और शताब्दियों में यह प्रक्रियाएँ घटित हुई हैं । बिलकुल इसी बिन्दु पर जबकि सब चीज़ें हमें आज के स्वरूप में दिखाई देने लगती हैं, कई प्रकारांतर व्यवस्थाएं भी जन्म लेती हैं । 

राष्ट्रवाद जैसे विचार इसी के आस पास उभरते हुए प्रतीत होते हैं । भौगोलिक विविधता अलग अलग तरह की संस्कृतियों को पोषित करते हैं और उनके बनने के कारक बनते हैं । इसी में भाषाएँ, रहन सहन, सभ्यता, खान पान सब कुछ तय होने लगता है । यहीं यह भी तय कर लिया जाता है, किसे अपना मानना है और किसे नहीं । इस जटिल बिन्दु पर हमें थोड़ी देर ठहरना चाहिए और उल्टी तरफ चलते हुए कुछ देर विश्लेषण का अवसर निकालना चाहिए । यह सारी सीमाएं, संस्कृतियाँ, भाषाएँ, सभ्यताएं, नदियां, पहाड़, मिट्टी, रेत, पेड़, पौधे, जंगल, रेगिस्तान, बादल, आसमान, पंछी, जानवर, लताएँ, बेलें, फूल, इत्र, ख़ुशबू, आग, पहिया, कुल्हाड़ी, ईंट, जीवन, कल्पना, स्वपन, जुगुप्सा, ईर्ष्या, प्रेम, कठोरता, दोस्ती, दुश्मनी, धैर्य, अधीरता, गीत, बोल और झरने का अस्तित्व कहाँ संभव हुआ ? यह निश्चित अवधि जिसे हम जीवन कह रहे हैं, जिसमें हमने यह सब अपनी कल्पना से रचा, जिसे हम इन दो आँखों से देख रहे हैं, जिसे हमसे पहले आने वाले और अब हम अपनी मेहनत से बुन रहे हैं, यह क्या है ? बहुत सरल और सपाट और उतने ही इकहरे अर्थ में हम सब एक ऐसी जगह पर हैं, जहाँ यह सब संभव हो पाया । हमारी मेहनत के बाहर यह मिट्टी, हवा इस पृथ्वी का होना बहुत सारी बातों को हमें यूं ही लेने की तरफ़ धकेल ले गया । जबकि असल में ऐसा नहीं है । कुछ भी स्वाभाविक नहीं है । कुछ भी नहीं ।


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