याद रखने वाली बात

एक बार एक चाँद था । उसकी रौशनी में बैठा वह कुछ सोच रहा था । उसे लगा, बारिश की बूंदों के साथ अगर वह नीचे आ पाता तो कितना खूब होता । इस कल्पना से वह बहुत रोमांचित हो उठता । वह बैठा है और इसी के ख़याल में डूबा हुआ है । जैसे रेल के डिब्बे में खिड़की खोलकर वह इन्हीं हवाओं में हिचकोले खा रहा हो । वह किसी से कुछ कहता नहीं है । बस बैठा रहता है । उसे कभी तो कोई प्रेम पत्र भी लिखना होगा । तब तक के लिए उसे कभी छुआ ज़रूर होगा । छूकर ही वह धड़कनों का अंदाज़ लगाना चाहता है । अगर कुछ सुन नहीं पाया फ़िर भी नब्ज़ मिल गयी, तब उनका यह साथ बहुत दूर तक चलता हुआ दिख जाएगा । वह तब भी मुझे कुछ नहीं बताएगा । उसे लगेगा, इस स्पर्श को कह देने वाली भाषा का उसके पास अभाव है । या कुछ ऐसा जो उसने महसूस किया है, वह भाषा में आते ही या तो टूट जाएगा या उसका एहसास कुछ कम होता जाएगा । वह कहता है, वर्जनाएं वह भी कहना चाहता है । कहता नहीं है । कोई कैसे अपने मन में भीतर की बात नहीं कह पाता, उसे इस पर भी कुछ कह लेना चाहिए । वह अभी जानता है, चाह कर भी न कह पाना उसे अंदर से कैसा कर जाता है । एक बार वह इससे बाहर आ गया, तब उन गले में फाँस की तरह फँसे हुए शब्दों को वह उस तरह नहीं कह पाएगा । जो होगा अभी नैसर्गिक होगा । उसमें कृत्रिमता का उतना अधिक पुट नहीं होगा । अगर वह इसलिए डर रहा है कि कोई पढ़ते हुए उसके बारे में कैसी छवि बना रहा होगा, तब उसे अपने लिए दलीलें गढ़नी चाहिए ।

सब इसे अपनी तरह गढ़ते हैं । जैसे एक यह है, जो लेखक का मैं है, वही उसकी कही बात का मैं होगा, ऐसा मानने वाले बहुत हैं । भले तुम्हारे बाहर सब ऐसा मानते हों, तुम्हें तो ऐसा नहीं मानना चाहिए । कभी मानना पर अभी इस शुरुवात में अगर यह बात लिखने में एक अवरोधक की तरह उपस्थित है, तब इसे किसी मुड़ती हुई गली की तरह पार कर जाओ । लिखना दरअसल अपने आप को ही क्रमिक रूप से विखंडित करना है । दूसरे अर्थों में हम जैसे हैं, वैसा दिखने का साहस हममें बहुत महीन या स्थूल गति से प्रवेश करता है । इसे महसूस करने का अभ्यास भी लगातार करना पड़ता है । यह किसी बिजली के कौंधने जैसा भी हुआ, तब भी, उसकी पृष्ठभूमि में एक प्रक्रिया अवश्य घटित हुई होगी । कुछ भी सहसा या आकस्मिक नहीं होता । जो ऐसा कहते हैं, उन्हें भी पता होगा, वह ऐसा जानबूझकर कह रहे हैं । वह नज़र में कुछ बचाए रखना चाहते हैं । नहीं चाहते, कोई उन तक पहुँचे । जहाँ तक बात ख़ुद को अभिव्यक्त करने की है उसके साधन बहुत है । जितने कलारूप हम देख पा रहे हैं, उनसे कहीं अधिक हमें नहीं दिख पा रहे होंगे । यह यात्रा अपने व्यक्तित्व को उन सीमित और प्राप्य साधनों के भीतर भी तराशा जा सकता है । जो साधन जितना सुलभ होगा, वहाँ उसके प्रयोक्ता उतने ही अधिक हो जाते हैं । भाषा के शब्द ऐसे ही सर्वसुलभ साधन बनते हैं । हर कोई उनके अर्थ, प्रयोग, अभिव्यंजना सबको जानता है । यहीं से सब शुरू करते हैं । कोई इससे पहले कैसे शुरू हुआ, अगर वह कह रहा है, तब उससे पूछना, कैसे ?

यह बात इसलिए भी याद रखने वाली है, क्योंकि तुम अकेले नहीं हो । बहुत सारे हैं । तब भी ऐसा क्यों हुआ होगा, कि किसी को पढ़ते ही हम उसके पास जाने लगते हैं । सबको नहीं । किसी किसी को । जो बात कहना चाह रहा हूँ, वह किसी पाठक तक तक संयोग से पहुँच जाओगे, इससे पहले यह बात समझ लेने वाली होगी, कि उस ख़ास तरह लिखते हुए तुम अपने अनुभवों, अपने अतीत, अपनी दृष्टि से बहुत कुछ कह पा रहे होगे, जो तुम्हें किसी के लिए पठनीय बनाएगा । इसे समझना बहुत मुश्किल नहीं है । जैसे लेखक एक तरह नहीं लिखते न लिख सकते हैं । वैसे ही हर पाठक भी तो अलग हुआ । उसका जीवन, उसके अनुभव, उसका वर्तमान कुछ तो ऐसा होगा, जो उसे तुम्हारे निकट लाएगा । इस स्थापना के बाद समझने वाली बात है, हम चाहकर किसी ख़ास तरह लिखना शुरू नहीं कर देते । कोई कथ्य हमारे पास है, यह हमारी विशिष्टता है । वह हमारे भीतर घटित हुआ है । अब उसे कह देना है । यह कह देने जितना सरल नहीं है । अभ्यास इसे साध लेने की अकेली कुंजी है । दूसरा रास्ता है पढ़ना । जब न लिख पा रहे हो तब हमें कुछ न कुछ पढ़ते रहना चाहिए । किताबें तो बहुत हैं तुम्हारे पास । अभी के लिए इतना ही । शेष, जो हमेशा बचा रह जाता है, फ़िर कभी ।

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