उसने कहा था

यह भी क्या बात हुई, उसने नाम नहीं लिया पर मेरी बातों पर अपनी बातें कह गयी । नाम लेना ज़रूरी भी नहीं है । नाम से हम एक दायरे में सिमट जाते हैं । वह नाम लेती तो कहते अच्छा तो इसके बारे में बात कर रही थी । अब सही है । यह सीमातीत होकर बचे रहना है । कोई आप तक नहीं पहुँच पाएगा । एक जगह लिख दिया, तुम उतना ही कहा करो, जितना तुम्हारा सच है । क्यों ऐसा एहसास होने देती हो, कि लगे वह सब तुम्हारे साथ घटित हुआ या तुम उसकी साक्षी हो । मैं तुमसे बस एक बार मिला । कोई बात हुई भी नहीं कि चलने का वक़्त हो गया । तुम ही तो लगती रही, कोई मिली है जो सब कह देती है । यह बात भी शायद इसी रौ में कह गया होऊंगा । सोचा नहीं था, तुम उन बातों पर इतना गौर करोगी । 

यह बात बहुत पते की है, अगर अपने लिखे में एक पंक्ति भी सच की कह पायी तो लिखना सध जाये । कभी एक झूठ को छिपाने के लिए एक परिचित सा संसार रचना पड़ता है । इस पर तो कुछ कहते नहीं बन पा रहा । यह दोनों बातें जब से सुनी है, डूब गया हूँ । यह भी हो सकता है, इस संभावना को ख़ारिज नहीं कर रहा, तुमने इन्हें कहते हुए बस कह दिया हो । मेरी बात का कोई हवाला कभी लिया ही न हो । पर इसकी संभावना बहुत कम लगती है । अंदर से लगता है, चुपके से तुमने मेरी बातों को अपने भीतर किसी नागफनी के काँटे की तरह चुभते हुए महसूस किया होगा । इस चुभन को तुम्हारे चेहरे पर महसूस कर रहा था।

मैं बस तुम्हारा कहना याद रखूँगा । कभी इस बात को याद करते हुए हम दोनों को याद आएगा । उसने कहा था ।

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