मरीचिका

जितनी दूर चाँद सितारे हैं, वह खुद को अपने लिखे से उतना ही दूर बताती है। क्या उसकी यह बात झूठ हो सकती है? वह इस पंक्ति को किसी और तरह से कहती तो उसकी तह में छिपी बात साफ़ देखी जा सकती थी। उसके मुताबिक वह अपनी दुनिया रचती है। उसमें जैसे किरदार बनते जाते हैं, वह कहती जाती है। हो सकता है, ऐसा करते हुए वह अपनी ज़िंदगी के खाली सफ़े भर रही हो। उसने ख़ुद न जिया हो, पर कह रही हो। अगर मुझे बिलकुल यही बात कहनी होती, तो किस तरह कहता। शायद यह सवाल मेरे लिए नहीं है। मेरे पास किरदार नहीं हैं। मैं ख़ुद किरदार हूँ। अगर कभी सीधे कहा जाना तय नहीं किया, तब बिना नाम दिये मेरा काम चल जाता है। हमेशा सामने रहने से जब ऊब होने लगे, तब यह तरीका अपनाया जा सकता है। वह जो अपने निकट के लोगों और सगे संबंधियों को लेकर इतनी चिंतित है, जिसमें उसे ऐसा कहना पड़ा, इसे समझना चाहता हूँ। वह तो यहाँ तक कहती है, उसका लिखा हुआ उसकी ज़िंदगी का आईना नहीं है। यह बात उसके बताने से काफ़ी पहले से जानता हूँ। वह जिस दुख को रचती है, वह उसके हिस्से का नहीं हैं। कुछ होगा, पर उस अनुपात में नहीं, जितना उसने कह दिया है। हम उस दुख का रूपाकार बदलते रहते हैं। कभी-कभी तो इतने सचेत हो जाते हैं, कहीं अपना चेहरा दिख जाने से डरने लगते हैं। यहाँ उसकी बात नहीं करना चाहता था। वह जैसा भी लिखे यह उसके कौशल, शैली या मन वगैरह पर निर्भर करता है। यह हमारे अनुभव संसार का विस्तार है।

मेरे कथ्य में कभी भी कोई ऐसी बात अगर दिख जाती है, जिसके हवाले मेरे पास न हों और उन्हें लिखने बैठ जाऊँ, तब वह लिखना कैसा होगा, कह नहीं सकता। हम सब अपना काम पर्देदारी से चलाते हैं। कहो। पर छिप जाओ। सामने आने की ज़रूरत नहीं। स्थूल की जगह सूक्ष्म होने में जितनी शातिरना अदा है, वह खुलकर कहने में नहीं है। जबकि इधर जितनी साफ़गोई से बातें कही हैं, उनमें यह दिन और इतनी अधिक सहजता पहले कभी नहीं थी। जो डर पहले लगता था कभी, वह पिछड़ गया है। या शायद वैसा लिखना ही कहीं छूट गया होगा। इस लिखने को लेकर सबकी अपनी समझ होती है। क्या पता वह भी ऐसा ही करती हो? हम किन विषयों को चुनते हैं, अधिकतर बातें इसी से तय होंगी, ऐसा नहीं है। यह कोई बना बनाया खाँचा नहीं है। इसमें हम जिस तरह की भाषा इस्तेमाल करते हैं, अगर वह हमारे अनुभवों से नहीं है, तब उसमें कृत्रिमता आना स्वाभाविक है। मैंने कभी उसे ऐसा नहीं कहा। पर यह सच है। किरदार रचने का मतलब यह नहीं है, वह कल्पना से ही बनेगा। हम जिस तरह का जीवन व्यतीत करते हैं, हमारी ज़िंदगी में जिन लोगों का आना जाना है, उनमें उनके हिस्से से अधिक कोशिशें इस तरह ख़ुद को नकली बनती हैं, जैसा तुम कर रही हो। एक वक़्त था, जब तुममें ताज़गी थी। तुम्हारे लिखे हुए को एक लड़की के जीवन से निकला हुआ मानता था। यह मेरे अंदर तुम्हारे मिथक बनने के दिन थे। अब इस शब्द को मरीचिका से विस्थापित कर देने पर आज की तस्वीर बहुत हद तक साफ़ हो जाती है। तुम वह लिखना चाह रही हो, जिसका कोई कच्चा ख़ाका तुम्हारे पास नहीं है। इसलिए कहता हूँ, उन सबको को अपनी मेज़ से हटा दो, जो नकल हैं। ऐसा पढ़ने की कोई ज़रूरत नहीं है।

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