इकहरापन

यह जो एक ही तरह का लिखना या हर बार एक ही भाव में गुम होते जाना है, इसे समझ नहीं पा रहा। कभी होता है, सुलझाने बैठता हूँ, कुछ देर बाद कोई सिरा पकड़ में नहीं आता। अभी जब इस शाम बिन पंखा चलाये बैठा हूँ, तब मृत्यु के बारे में सोच रहा हूँ। यह किस तरह मुझे रच रही है? चाचा के नहीं रहने पर जैसा होता गया हूँ, यह क्या है? जितना लिखता जा रहा हूँ, उतना अंदर नहीं उतर रहा। यह अनसुलझा सा है। अनमना नहीं। पर कुछ वैसा ही। उनकी अनुपस्थिति में यह इसी तरफ़ धकेल लाया है। उन भावुक सी, कमज़ोर करती पंक्तियों से घिरा चुपचाप बैठा हुआ हूँ। क्या इसकी कोई और वजह भी है? या इसे ही एकमात्र सत्य की तरह मान लिया है? इसे दोहराव कह सकते हैं। इसमें कोई नयी बात नहीं है। कितनी ही बार तो पहले भी कह चुका हूँ। यह कोई नयी बात नहीं है। सवाल है, इससे एक दूरी किस तरह बनाई जा सकती है? अभी कागज पर लिख रहा था, हम जब पैदा हुए थे तभी से एक परिवार का हिस्सा हैं। यह परिवार एक वृत का निर्माण करता है। इस घेरे के बीच रहते हुए हम बड़े हो रहे थे और यह दूरी जिसमें हमारे पास उन सबके पास रहने के सीमित अवसर हैं, वहाँ हमारी स्मृतियाँ जो हमें अतीत ही नहीं भविष्य के दिनों की आहट सुना जाती हैं, उनमें हम कातर ही नहीं हुए, संवेदनशील होते हुए उस शून्य से भरे रहे, जो हमें लगातार खाली करता रहा। इससे लंबे समय तक बचना असंभव था।

इस दुनिया में जीने के लिए सबसे ज़रूरी शर्त है, हम उम्र में आगे बढ़ते हुए ईर्ष्या, द्वेष, घृणा जैसे कृत्रिम भावों की निरर्थकता को बहुत पास से महसूस करते रहें। यह हमारे उन दिनों के अवशेष हैं, जब शरीर में एक अजीब सा विद्रोह घर कर जाता है। ऐसा होना, हमें विस्तार की तरह लगता है पर यह असल में संकुचन का प्रतिबिंब अधिक होता है। हम ऐसा आईना रचते हैं, जिसमें हमें सिर्फ़ अपना अक्स दिखाई देता है। अभी पिछले हफ़्ते की बात होगी। बिरेन्द चाचा ने लखनऊ में पथरी का ऑपरेशन करवाएँगे। बहन ने वहाँ से जो तस्वीरें भेजी हैं, उनमें मंजु बुआ हैं, चाचा और विजय अंबेडकर पार्क में अगल बगल खड़े हैं। चाची तो गाँव से साथ गयी होंगी। बड़की अम्मा भी सुनने में आया, वहीं थीं। इसे किस तरह समझना चाहिए। 

ऊपर कही बातों को इस घटना के साथ लगाते हुए यह साफ़ दिख जाता है, हम सीमित वक़्त के भीतर, उस घेरे में अपने बूढ़े होते दिनों को गुज़रता देख, जब हमें अपनी अवस्था का मौलिक ज्ञान होता है, तब हम एक दूसरे के बहुत निकट होते जाते हैं। कोई इन अदृश्य से यादृछिक वृत्तों से बाहर नहीं जाना चाहता। जीवन की इस यात्रा में इस तरह की निरर्थकता का बोध हम सबको होगा। अहंकार तब व्याधि की तरह चुभने लगेगा। दरअसल यह रुकावट ही है। सब समझ जाते हैं, इन बीतते दिनों में साथ रहने के दिन लगातार कम होते जाएँगे। पास रहकर किसी की स्मृति में स्थायी भाव की तरह बन पाना ही सबको एकमात्र उपलब्धि लगता है। वह सब इधर यही कर रहे हैं। मैं इसे इतनी दूर से, उम्र के इस क्षण में वृद्ध होते हुए कितना सब सोचते हुए चल रहा हूँ। यहाँ इतनी दूर से उनकी स्मृति में नहीं हूँ, तब क्या यहाँ किसी याद में पेड़ की तरह खड़ा रहने की हिम्मत मुझमें है?

यह दूरी मुझे इसी तरह रच रही है। इसे इकहरापन कह ज़रूर रहा हूँ। पर मुझे पता है, इस दोहराव में भी उस सघनता को व्यक्त करने की ताकत नहीं है। मुझे लगा था, कुछ किताबें पढ़ते हुए इससे बचा जा सकता है । पर नहीं। ऐसा कुछ नहीं होने वाला। मन जब तक यहीं अटका हुआ है, तब तक कुछ नहीं हो सकता हूँ। इसमें दुख है, एकांत है, अपने भीतर गुंजायमान ध्वनियों की अस्पष्टता है। एक बहुत रिक्त सा खाली स्थान है। इस खाली स्थान को कभी न भर पाने की इच्छा है। फ़िर अगर आप मुझे पढ़कर ख़ुद को अवसादग्रस्त महसूस करते हैं, तो यहाँ मत आया कीजिये।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

बेतरतीब

आबू रोड, 2007

हंस में आना

शहतूत आ गए हैं: मेरी पहली किताब

हिंदी छापेखाने की दुनिया

जगह

वापसी