टूटना

इधर न जाने क्या हुआ है, अक्सर जब दिमाग खाली लगता है, जबकि वह होता नहीं है, तभी अचानक कुछ कौंध जाता है। इस चमक में कितनी सारी यादें झिलमिला जाती हैं। कभी ऐसा लगता है, जैसे कुछ नहीं बचा। सब शून्य में धँस गया है। यह खालीपन है या इसी खालीपन से भर गया हूँ। यह मेरी आदत के मुताबिक कहीं अटक जाने जैसा है। रुके रहो। तब तक रुके रहो, जब तक वह दीमक की तरह अंदर से खोखला न कर दे। तबसे सिमटता जाता हूँ। यह ख़ुद को दोहराने जैसा है। मैं उन सब जगहों को सिरे से याद कर रहा हूँ, जो चाचा के जाने से खाली हो गयी हैं। उस तस्वीर से लेकर उन सब स्मृतियों तक उन्हें छूकर लौट आने जैसा अनुभव कैसा है। हम रामनगर होते हुए गड़वा नौतला जा रहे हैं। मैं आगे साइकिल के डंडे पर लपेटे तौलिये पर बैठा हूँ और भाई पीछे कैरियर पर बैठा है। चाचा साइकिल चला रहे हैं। कितनी दुपहरों को हम ऐसे निकले होंगे, इसका कोई हिसाब नहीं। वह सिर्फ़ साइकिल तक ही पहुँच पाये। खड़खड़े से शुरू हुए, साइकिल पर खत्म। आज इस दिन में भी कुछ ऐसा नशा है, जिसमें हर इतवार गाँव की उन ढलती शामों में टेलीविज़न पर चार बजे वाली फ़िल्म का इंतज़ार पता नहीं कैसा कर जाता है। सटर वाला टीवी है। जिसमें ताला लग जाता है। तपती छत के नीचे सब बोरे से लेकर चारपाई और चाचा की शादी में मिली कुर्सियों पर बैठने को लेकर हुए झगड़ों को निपटाकर, चुपचाप एकटक सामने देख रहे हैं। बँटवारे में चाचा को टीवी तो मिला नहीं। यह पहले ही खराब हो गया होगा। इसी सब में टेप और कैसेट का ज़माना पीछे रह गया। 

चाचा अब न कुछ देख पाते, न सुन पाते। मैं इसी घटना को कभी समझ नहीं पाया। जो चाचा घंटों रेडियो सुनते रहते थे, बाद के सालों में किस तरह रहे होंगे। वह जब अपने परिवार को लेकर चौराहे वाली पक्की दुकानों को घर की हैसियत से इस्तेमाल करने लगे, तब बिजली का कनेक्शन नहीं लिया। ज़िंदगी ऐसे ही ढबरी की रौशनी में बीतने लगी। मेरा मन इस कदर उलट पुलट गया है, जिसमें कोई सिरा पकड़ में नहीं है। लेटता हूँ, और लेटते ही ऐसी कितनी ही जगहों पर चाचा की स्मृतियाँ लौटने लगती हैं। हर बार वही ब्यौरे नहीं देना चाहता। न यह कहना चाहता हूँ, यह मुझे कमजोर करते हुए रुला जाती हैं। इन स्मृतियों में वह हैं, यही वह बात है, जिनकी वजह से यह मेरे अंदर ख़ुद को दोहराने लगती हैं। जब एकबार वह धागे सा उधड़ कर खुलने लगती हैं, तब अजीब सा भाव घेर लेता है। यह अवसाद नहीं है। यह रिक्तता है। यह चाचा की अनुपस्थिति है। उनका गायब हो जाना है। यह अगर मुझे खा नहीं रही, तब इसे क्या कहना चाहिए, समझ नहीं पाता। नहाते वक़्त चाचा अपना नेकर जिस कुंडी पर टाँगते थे, उस पर आज तक कुछ भी नहीं रखा। लगता है, जैसे अभी भी वह नीला नेकर वहीं सूख रहा है। इन छह सात महीनों में चाचा से चाह कर भी बात नहीं की।

वह भी हमारी तरह पुराने दिनों में कहीं रह गए होंगे। मेरी कोई बात अगर उन्हें पीछे ले जाती और उनकी आँखें भर आती, तब क्या करता? मेरे और चाचा के बीच का यह अबोलपन, वह बाद के दिनों में समझे होंगे। जब वह सहसा चारपाई पर लेटे-लेटे इस खयाल के बाद भी उठ नहीं पाते होंगे, तब मुझे सामने देखकर उन्हें कुछ याद ज़रूर आया होगा। वह किस तरह वहाँ मेरे एक बार चले जाने के बाद दोबारा लौट आने को समझ पाये होंगे। यह बात कभी उनसे कर नहीं पाया। उन्हें इतना असहाय देखा कर कभी इस हिम्मत से भर नहीं पाया कि उनके सिरहाने बैठकर दो पल किसी तरह कोई बात छेड़ पाता। शायद इन दिनों के पुराने पड़ जाने के बाद, जब इनका ताप कुछ कम हो जायेगा, तब ख़ुद यह बचकानी सी बात लगे, फ़िलहाल यह बहुत साहस का काम था। यह हिम्मत अभी मार्च में थोड़ी सी जुटा रहा था। सोचा था, रेल पाँच बजे लखनऊ पहुँच जाएगी, वहाँ से अगर छह बजे भी बस चलती है, तब भी दस बजे तक गाँव पहुँच जाऊंगा। लेकिन नहीं। यह जो उनका वहाँ अब कभी नहीं होना है, यही लगातार तोड़ रहा है।

इस टूटने में इन बातों को न लिखने की ज़िद भी है। जिसमें न मालुम कितनी ही बार ख़ुद रद्दोबदल कर आया हूँ। हर बार सोचता हूँ, अब ख़ुद को इस तरह नहीं होने दूंगा। पर नहीं। कुछ दिन बीतते हैं, वही सब मेरे ऊपर फ़िर से हावी होने लगता है। इससे बचने की कोशिश बेकार है। सोचा था, सब कभी नहीं लिखुंगा। पर क्या करूँ? अगर इसे एक पंक्ति में कहूँ, तब यह सिर्फ़ इतनी सरल रेखा है, जिसमें चाचा का जाना, हमारे अतीत से वर्तमान में आते धागे का चिटक जाना है। इसमें गाँठ भी पड़ जाती पर यह जुड़ जाता, तो कितना अच्छा होता। पर नहीं। ऐसा कुछ होता दिख नहीं रहा है।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

बेतरतीब

आबू रोड, 2007

हंस में आना

शहतूत आ गए हैं: मेरी पहली किताब

हिंदी छापेखाने की दुनिया

जगह

वापसी