विषय का चयन

लिखते हुए यह भी गौर करने लायक बात है, हम अक्सर किन विषयों पर लिखते हैं। यह चुनने से अधिक हमारे परिवेश पर निर्भर करता है, ऐसा कुछ भी कहना नहीं चाहता। एक हद तक यह एक महत्वपूर्ण कारक ज़रूर है। जब यह सवाल खुद से पूछता हूँ, तब लगता है, इस पर कभी बैठकर व्यवस्थित चिंतन नहीं किया। पहली नज़र में मुझे जो चीज़ लिखने के लिए सबसे ज़्यादा मजबूर करती है, वह बहुत सारे अतिरेकी क्षण हैं, जिनसे घिर जाने पर कह देना ही एक मात्र विकल्प बचता है। यह किसी भी तरह से कह देना है। जो भाव जैसा मेरे अंदर उतर रहा होता है, उसे उसके सबसे करीब जाकर कह देने में जो चुनौती है, वही मुझे सबसे अधिक प्रिय है। दूसरे शब्दों में कहूँ, तब यह कुछ-कुछ वैसा ही है, जिसमें हम इस पल जिन भावों, अनुभूतियों से गुज़र रहे हैं, पढ़ने वाले को भी उन्हीं के पास लेकर आ पाने में जो संतुष्टि है, वह मुझे ऐसा बनाती रही है। जो मुझे पढ़ते हैं, लगातार लंबे समय से पढ़ते रहे हैं, वह भी ऐसा महसूस करते होंगे। अगर आपको ऐसा नहीं लगता है, तब आप किसी भी पिछले पन्ने पर जाकर इस दलील की जाँच कर सकते हैं। लोग इस आत्मपरकता को दोष की तरह देखते हैं। जिस तरह के समय में हम स्थित हैं, उसमें बार-बार इस पंक्ति को दोहराना ठीक तो नहीं लगता पर इतना ज़रूर है, हम ऐसे होकर खुद को बचाए रखने की कोशिश कर रहे हैं। फ़िर तीस साल की उम्र एक ठीकठाक गणितीय संख्या तो नहीं है, पर इसके पार आ जाने पर देखता हूँ, बहुत सी बातें कोई नहीं कह रहा है।

जिस शहर में हम रह रहे हैं, वहाँ हम पल कितने ही ऐसे दबावों से हम गुज़रते होंगे। शादी हो जाना। नौकरी का न लगना। आठ हज़ार मासिक वजीफे को लाटरी के टिकट की तरह देखते रहने के बाद मेरे पास ज़्यादा कुछ कहने के लिए बचता नहीं है। इसमें जिन तरहों से दुनिया मेरे आगे खुलती है, उन्हें संग्रहकर्ता की तरह अपने यहाँ जमा करता जा रहा हूँ। मुझे अपने वर्तमान में जो एक पल बाद ही अतीत बनता जा रहा है, उसमें उस बीत गए पर थोड़ा ठहर कर अच्छी तरह देखना, रचनात्मक प्रक्रिया का हिस्सा लगता है। इसी सिलसिले में मेरे अंदर हमारे अतीत की स्मृतियाँ हैं, जिन्हें अब इस वर्तमान में बैठे हुए दोबारा महसूस करना चाहता हूँ। इन्हें कोई नहीं लिखेगा। किसी को इसकी ख़बर भी नहीं लगेगी। जो इन घटनाओं में पात्र हैं, जिन परिस्थितियों से वह गुज़र रहे हैं, इनमें रहते हुए किसी को भी इसके घट जाने के बाद लिखने का ख़याल नहीं आता होगा। मैं यहाँ ख़ुद को दस्तकार नहीं कह रहा। न यह कहने में बहुत आरामदायक स्थिति में हूँ कि इन्हें मैं ही लिख सकता था। नहीं। इनमें से कोई बात पूरी तरह से ठीक नहीं है। 

फ़िलहाल तो बस यही कहना चाहता हूँ, यह अपने आप में एक पीड़ादायक प्रक्रिया है, जिससे गुजरते हुए उन सब ब्यौरों को लिखने की बात मेरे मन में चलती रहती है। इसके अलावे और कौन से महत्वपूर्ण बिन्दु हैं, जिनके बीच लिखने के विषय तय करता हूँ, इस पर कुछ भी तयशुदा कुछ नहीं कह सकता। यह मन में लगातार कई सारे बिन्दुओं को एक साथ लेकर चलना है। एक डायरी बनाई है, जिसमें किन्हीं बिन्दुओं को बाद के लिए लिख लेने की आदत अभी तक नहीं बन पायी। कभी मन होता है, तब मोबाइल में वर्ड फ़ाइल खोलकर नोट ले लिया करता हूँ। 

यह वह सारे सूत्र होते होंगे, जो बिजली की तरह कौंधते हुए मन में उजाले की तरह फैल जाते होंगे। इससे पहले वह गायब हों, उन्हें ऐसे सहेज कर रख लेना कभी-कभी बहुत काम का लगता है। कभी ऐसा भी हुआ है, मेज़ पर पड़ी कतरनों पर कुछ लिख लिया और मौका लगे एक दो दिन में उन्हें कहने की कोशिश भी की है। कुल मिलाकर यह वह सारी बातें रही होंगी, जिन्हें एक या दो पंक्तियों में समेट देने के बाद कहने के लिए कुछ बचा नहीं होगा। जबकि इधर केन्द्रित होकर एक विषय को उसकी सबसे चरम सीमा तक लाकर छोड़ने की आदत बनाना चाहता हूँ। जहाँ पहुँचकर कर ऐसा लगे इसके बाद कुछ कहा ही नहीं जा सकता था। या ऐसा, जैसे अभी कितना कुछ तो कहना बाक़ी रह गया है। यही वह उच्चतम सीमा है, जहाँ पूरे होने और अधूरे रह जाने के ख़याल एक साथ दिमाग में रेशम के तार जैसे दिखने लगते हैं। 

और कौन-कौन सी बातें हैं, जिन्हें यहाँ इस शीर्षक के अंदर कह देना चाहता हूँ? अंदर चल रहे लगभग सभी बिन्दु आ गए हैं लगता।

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