भाषा का सवाल

कभी-कभी मुझे यह एहसास होता है, जिन शब्दों या वाक्यों को अपनी बातें कहने के लिए इस्तेमाल करता हूँ,उनमें एक तरह की कृत्रिमता या बनावटीपन है। दरअसल यहाँ मैं अपनी भाषा पर थोड़ी देर बात करना चाहता हूँ। जिस भाषा का प्रयोग करता हूँ, वह कैसी है? इसकी प्रकृति को अगर थोड़े खुलासे की ज़रूरत है, तब इसे किस तरह से देख पाऊँगा? एक तरह से मुझे यह लगने लगा है, यह जिस-जिस जगह मुझसे दूर होती जाती है, वहाँ इसमें औपचारिकता प्रवेश कर जाती होगी। जैसे, जब, जिन जगहों पर यह संवाद करना चाहती है, वहाँ एक तरह का दंभ या अहंकार इसमें समा जाता होगा। यह एक ऐसी जगह पहुँच जाती है, जहाँ उन शब्दों में यह भाव इस कदर घुस जाता है, के लगने लगता है, वह जो दूसरी तरफ़ है, उसका अनुभव संसार, उन कहे जा रहे वाक्यों में वर्णित घटनाओं, दृश्यों, क्षणों से बिलकुल अनभिज्ञ या अपरिचित है। 

आत्मपरकता भी एक स्तर पर इसका निर्माण करती होगी। जिस तरह से कहने का तरीका है, वहाँ मुझे जैसा लग रहा है, यह भाव ऐसे हावी हो जाता है, जहाँ बाकी सब गौण या नगण्य हो जाता है। कहने के तरीकों और मेरे अतीत के हवालों में यह उतना अधिक नहीं दिख पाता, जितना कभी किसी चीज़ के तफ़सरे में इसे पाता हूँ। समझाने के लिए वहाँ ऐसे कारक चिन्ह या विकारी, अविकारी प्रयोग में शामिल हो जाते हैं, जिनसे मेरे अचेतन इतना सचेत नहीं रह पाता। कभी-कभी ख़ुद भी दोहराता हूँ और बहुत सतर्कता के साथ यहाँ व्यक्त करता हूँ। पर इस प्रक्रिया में अतिरेक भी एक निर्णायक कारक है। हम चाहते न चाहते तब एक पदानुक्रम बनाते हैं, जहाँ लगता है, कहने वाला सुनने वाले से एक क़िस्म की दूरी पर है। एक वह है, जिसे लगता है, उसने कुछ जान लिया है। दूसरा वह है, जिसे वह बताना चाहता है। इस बताने में वह निरा अबोध, अल्पमति, अल्पज्ञ बन जाता है। 

मुझे इससे बचने की ज़रूरत है। ऐसे होने से एक तो संवाद बाधित होता है और दूसरा, हमारे (कथित) ज्ञान के वजन से वह पाठक इस तरह अपने सारे तंतुओं को जोड़कर भी बात को समझने में असमर्थता जता देता है। ऐसा नहीं है, वह कुछ भी ग्रहण नहीं कर रहा, वह कर रहा है, लेकिन भाषा की यह प्रकृति उसे, उसके आत्मविश्वास को तोड़ देती है। यह मेरी भाषा का कब हिस्सा हो गए, कह नहीं सकता। शायद हर लेखक के जीवन में यह दौर आता होगा, जब वह कुछ ऐसी मूलभूत चीजों की तरफ़ आकर्षित हो जाता होगा, जिसमें उसे लगने लगता है, जो मुझे पढ़ने वाला पाठक है, वह अभी मुझसे बहुत दूर है। इस दूरी को पाटने की गरज में यह ऐसी हो जाती होगी। यह दो बिलकुल अलहदा और मुखतलिफ़ ज़िंदगियों के बीच के अंतर को नज़रों के सामने लाने की कोशिश होती होगी। तय कुछ भी नहीं। वह दोनों या बहुत सारे लोग अलग-अलग समय में अपना रोजाना ख़ुद के चौबीस घंटों को बाँट रहे हैं। उनके बीतने में उनका अख़्तियार बिलकुल भी न हो, तब भी यह विभाजन हम सबमें मौजूद है। 

फ़िर जो बात ऊपर कह आया हूँ, जिन जगहों से वह देख रहा है, उसके देखने में यह निरर्थकता बोध भी समाहित है। वह सोचता है, जिस तरह से वह अपने अतीत की उस ख़ास उम्र को जी आया है, अगर उसे कह देने से कुछ खुलासे वह करता चलेगा, तो बेहतर होगा। यह कितना बेहतर है, सबके पास इसकी अलग-अलग कसौटियाँ है। फ़िर भी वह कहता जाता है। मुझे लग रहा है, यहाँ तक आते-आते, कई सारी बातें एक-दूसरे को काट रही हैं। कुछ समानान्तर चलने लगी हैं या आपस में गुथकर इस भाषा वाले सवाल को थोड़ा और उलझा गयी हैं। इसकी भी बिलकुल संभावना है, किसी को कुछ धागे भी मिले होंगे, जो किन्हीं बातों को खोलने और अपने निजी जीवन में उसके उपयोग के रास्तों को समतल बनाने में आगे मददगार साबित हों। स्वयं यह बौद्धिक प्रक्रिया मेरे लिए कुछ कर पायी है या नहीं, यह भविष्य बताएगा। अभी बस लिखना है। जिन सवालों को देख पा रहा हूँ, उनके मेरे जवाब क्या हो सकते हैं? मेरे लिए सवाल सिर्फ़ इतना है, मेरा लिखा हुआ किस तरह मुझसे बाहर निकलकर मुझसे बात कर पाता है।

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