जब मैं चुप हूँ

इधर एकदम से सब घुट गया है। गला, मौसम, हवा, परछाईं। सब अपने अस्तित्व के सवालों में घिर गए हैं। इसमें एक मिट्टी ही है, जो थोड़ा बहुत ख़ुद को बचाए हुए है। मिट्टी ऐसा क्यों कर पायी, यह जानना बहुत मुश्किल नहीं है। वह सब सोख लेती है। हमारी त्वचा में भी यही गुण है। कभी-कभी वह इसके विपरीत व्यवहार करती है। कब? जब हम धूप में होते हैं और हमें पसीना आता है। तब वह अपने रोम छिद्रों को खोल देती है। उस क्षण मुझे एहसास होता है, हम एक ही काम दो तरह से कर सकते हैं। एक दूसरे अर्थ में, हम जिस काम को जैसे देखने के आदी होते हैं, वह उसके अलावे भी किसी और विधि से किया जा सकता है। इन दिनों, जब कुछ भी कहना मेरे अंदर ख़ुद को नहीं बुन रहा, तब यही सोच रहा हूँ। जो अनुभव संसार है, उसमें ऐसा क्या है, जिसे कहे बिना नहीं रहा जाएगा। इसलिए देखा होगा, कई बार अपने अंदर इस लिखने को टाल देता हूँ। कुछ तो इस बढ़ती गर्मी के कारण और कुछ उन अनुभूत हुए अनुभवों को अपने अंदर देर तक घुलने देने के अवसरों को बनाने के लिए। देखना चाहता हूँ, कब तक वह मेरे अंदर वैसे बने रहते हैं? अगर वह बने रह गए, तब समझूँगा, उन्हें कहा जाना ज़रूरी है। वरना कुछ भी कहने से ठीक चुप रहना है। चुप रहते हुए हम सब भली प्रकार से देखते रह सकते हैं। जैसे कहने के लिए जिस हड़बड़ाहट या अरबरी में थे, वह आवेश शिथिल तो नहीं पर मंथर ज़रूर पड़ जाते हैं। इन दिनों ऐसा ही हो गया हूँ। 

ऐसा रहने में बस यही एक टोह लेने बैठा हूँ, जब लिखुंगा, तब क्या लिखुंगा। तब कुछ लिख भी पाऊँगा? वैसा जो मेरे अंदर है? हो सकता है, ऐसा कुछ भी न कर पाऊँ, तब पीछे मुड़कर इन दिनों की तरफ़ मुड़ जाऊँगा। यहीं मेरे अनकहे दिन, शाम और यह डूबती रातें होंगी। उनमें अबोले शब्द और भाव होंगा। इन्हें छूकर इस एहसास से ख़ुद को भरा हुआ महसूस करूंगा, कुछ तो था, जो मेरे अंदर मिट्टी की तरह बनना शुरू हुआ था। इनमें कुछ दिन परती छोड़ देने वाली बात भी याद आएगी। बहुत दिन हुए, इसी बात को भूल गया था। इसमें सिर्फ़ सोखना नहीं था, उसका भुरभुरापन भी था। कुछ चुभते कुछ मुलायम दाने भी थे। वहीं कुछ कल की जड़ों के वादे भी होंगे। जैसे उन्हीं वादों के लिए अपने आज में रुक गया हूँ।

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