तुम्हारी किताब

अगर किसी की किताब सड़क किनारे, फुटपाथ पर बिखरी हुई सकड़ों किताबों के साथ चुपचाप पड़ी हो, बिक रही हो, तब किसी को कैसा लगना चाहिए? फ़र्क तभी पड़ता है, जब वह जानता है। नहीं जानने से कोई फ़र्क नहीं पड़ता किसने उसे लिखा है, वह क्यों ऐसे लिख रहा है। इस इतवार दरियागंज तुम्हारी किताब 'तीन रोज़ इश्क़' पर नज़र पड़ी। उसके साथ बहुत सी और भी किताबें थीं, जिन्हें पहले से जानता हूँ। हृदयेश जोशी की लाल लकीर, अल्का सरागवी की ब्रेक के बाद, निखिल सचान की यूपी 65, मैं पाकिस्तान में भारत का जासूस था, लेखक का नाम याद नहीं। बम संकर टन गणेश। सब इन किताबों को देखते हुए गुज़र रहे हैं। कोई रुक नहीं रहा है। मैंने रुक कर थोड़ा उलट पुलटकर इन्हें देखा। दुकान वाला बोला, हाफ रेट पर है। इससे एक पैसा कम नहीं होगा। तुम्हारी किताब मेरे पास है। मैं थोड़ी देर रुक कर देख रहा था, कोई कोई हिन्दी की किताबें देखकर वहाँ मेरे जैसे कोई और रुकता है या नहीं?

हो सकता है, यह मेरी कोई गलत तरह की इच्छा रही होगी। वहाँ आने वाले पाठक नहीं खरीदार होते हैं। मैं भी ख़रीदार हूँ पर थोड़ा पढ़ने की इच्छा मेरे अंदर बची हुई होगी। मैं उस बहुत बड़े पुरानी किताबों के बाज़ार में खड़ा हूँ। निखिल ने अपनी किताब यूपी 65 के पहले खुलते पन्ने पर अपने हाथ से कभी लिखा होगा, इस उम्मीद में, कि मेरे और आपके भीतर बनारस बना रहे, हमेशा । जिसने इसे पहली दफ़े ख़रीदा होगा, उसने अपने हिस्से का बनारस अपने अंदर रख कर किताब को आगे कर दिया। उसने ख़ुद कबाड़ी को इसे बेच दिया, घर शिफ़्ट करते हुए छोटे से कार्टन में यह आ नहीं पा रही थी या हो सकता है जिसने किताब ख़रीदी होगी, उसकी अनुपस्थिति में घर वालों ने पीछे से घर से इसे रवाना कर दिया हो। यह भी हो सकता है, वह अपने से बाहर तुम्हारी किताब को भेजने की कामना से भर गया हो। कई संभावनाओं में से मेरे दिमाग में अभी यही आ रही हैं। आख़िरी वाली पता नहीं कैसी इच्छा है। है भी या नहीं पता नहीं। अच्छा हुआ तुमने अपनी तरफ़ से कोई अपेक्षा पाठक के कंधों पर नहीं लादी।

 बड़ी देर तक तो मैं यही सोचता रहा, किसी ने कितनी हसरतों से अपनी किताब पर बतौर लेखक कुछ लिखा होगा और वह समवेदनाएं अपने पाठक की तरफ़ संप्रेषित की होंगी। मेरी समझ में कुछ नहीं आया। ख़ुद किताब लिखने के बावजूद यह लिखना क्यों ज़रूरी था, यह भी समझ नहीं आया। थोड़ी देर में एक लड़की आई। उसने किताब उठाई। पन्ने पलटे। करिने से वापस रख दी। वह उसे नहीं ले गयी। मेरे फोन में तुम्हारी आवाज़ है। तुम आख़िरी कहानी का शुरवाती हिस्सा पढ़ रही हो। वह भी एक सर्द ढलती शाम का पहला शब्द, नथिंग एक्सट्राआर्डिनरी.. यह कितनी ही मर्तबा उन शब्दों को पढ़ते हुए कान में गूंज सा जाता है। मैंने अभी तक वही एक कहानी अभी तक पढ़ी है। पूरी नहीं अधूरी।

एक वह हिस्सा जिसमें एक लड़की शब्दों को इकट्ठा कर रही है। उसके भी कुछ क़तरे ख़ुद को अंदर बुनते रहे हैं। क्रमांक अट्ठाईस, पेज नंबर सत्तासी। मंगोल, अफगानी, सब्यसाची। सब घूम जाता है। तुम्हारी किताब का नया एडिशन आ गया है। बधाई। मैं तब इसी गरज से बड़ी देर तक खड़े रहने के बाद वहाँ से लौट चला। बस तुम्हारी किताब किसी और सहृदय पाठक के लिए पीछे छोड़कर दिल्ली गेट मेट्रो स्टेशन, गेट नंबर तीन के अंदर दाखिल हो गया। कोई और उसे अपने साथ ले जाएगा। अपनी यादों का हिस्सा बनाएगा। कहीं कोई चिट टाँक लेगा अपने दिल पर।

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