निकट भविष्य

पता है, मैं किसी चीज़ को लेकर सबसे ज़्यादा सोचा करता हूँ? एक वक़्त जब स्टीफन हॉकिंग के कहने के बाद अगले छह सौ साल में हम यह ग्रह हमेशा के लिए छोड़ रहे होंगे, तब वह कौन होंगे, जो पीछे छूट जाएँगे? कोई छूटे तो मैं भी उन छूटने वालों में होना चाहता हूँ। यहीं इसी जगह से चालीस किलोमीटर ऊँचा एवरेस्ट मुझे दिख रहा होगा। आसमान में कहीं ऊपर छिपता हुआ। कई और पहाड़ ऊपर की दिशा में बढ़ रहे होंगे। इस दृश्य को सोचकर कोई हरारत नहीं होती। बस उससे कभी अनुपस्थित नहीं होना चाहता। तब हम जितना दोहन कर पाते होंगे, उससे कहीं ज़्यादा दोहन करने के बाद उसे नए तरीकों से प्रयोग करने की तरकीबों में विज्ञान को लगा देने के बाद भी चैन से नहीं बैठ रहे होंगे। इसकी शुरुवात उन अनदेखी जगहों को देख लेने की ज़िद से होगी। सब जितना नहीं देखा गया है, वहाँ तक पहले पहुँचने की इच्छाओं से भर जाएँगे। कोई कंपनी वहाँ जाकर उस क्षण के लिए औज़ार मुहैया करवाएगी। पर्यटन से भी दो चार कदम आगे जाकर सब स्थगित हो जाएगा। इच्छा वहाँ जाने की है, जहाँ सड़क नहीं है, बर्फ़ से ढककर सब गुम हो गया है। जिस हवा में हम सांस लेते हैं, वहाँ वह हवा भी नहीं होगी। कोई रंग नहीं होगा। सब झक सफ़ेद। चमकता। दमकता। चुंधियाता। नीला आसमान। इंसान की तो बात ही क्या। रेत नहीं उड़ रही होगी, वह पत्थर हो चुकी होगी। पानी बह नहीं रहा होगा, तब तक जम गया होगा। वह उस जम गयी नदी के ऊपर चलने का सुख लेना चाहते हैं। यह उन नदियों के तल में जाकर उन्हें उलीचने जैसा है। जो आधार है, जो उलटने पुलटने की कोशिश है।

एक पूरा तंत्र होगा जो यह मुखौटा दिखाकर सबके सामने आएगा, जो कह रहा है, वह हमारा सहयोगी है। जो दुर्गम है, सुदूर है, उसे हमारी पहुँच में लाने के दावों के साथ अपने मुनाफ़े को छिपा जाएगा। हम भले इस दंभ या अहंकार से न भरे हों पर हम सबसे मासूम किरदार बनने की कोशिश में उनके लिए एक पुर्ज़े में तब्दील हो जाएँगे। वह हमें एक संख्या में तब्दील करते हुए उस तंत्र को मिली स्वीकार्यता में परिवर्तित कर लेगा। जब उसके पास लोग एक गणितीय संख्या के रूप में होंगे, वह उनका किसी भी रूप में उपयोग करते हुए उस दिशा में चल पड़ेगा, जहाँ उसे जाना है।

कल इसी बात को एक उदाहरण से कह रहा था, एक वक़्त ऐसा आएगा, जब शहरों के फुटपाथों पर सैलानी लगने वाले लोग अस्थायी टेंट लगाकर हफ़्ता दस दिन से रह रहे होंगे। वह आते-जाते लोगों को रोक-रोक कर पूछ रहे हैं, शहर में सबसे बढ़िया खाना सस्ते में कहाँ मिलेगा? कौन सी बिल्डिंग सबसे ऊँची है, जहाँ वह अपने साथ लाये ऑक्सीज़न सिलेन्डर का उपयोग कर पाएंगे। इतना ही नहीं वह कुत्तों के गले में पट्टा डालकर घूमते लोगों के साथ अपने बड़े-बड़े कैमरों से फोटो उतार रहे होंगे। आप अपनी रचनात्मक मेधा का इस्तेमाल करके इस शृंखला को और रोचक और भयावह बना सकते हैं। यह स्थिति भले उस भयावयता को बहुत नुकीले और पैने रूप से स्पष्ट नहीं कर रही होगी, फ़िर भी कमोबेश यह एक दिन वास्तविकता बनेगा, जहाँ वह अपने ब्यूटेन गैस सिलेन्डर पर कूकर रखकर लिट्टी और खिचड़ी बना पका रहे होंगे। हम मूक दर्शक होंगे।

अगर आपको यह दृश्य पहले पैरा में वर्णित स्थितियों की तरफ़ ले जाता हुआ नहीं लग रहा, तब क्या ही किया जा सकता है? मैं तो बस यही कर सकता था। फ़िर मुझे तो लगा था, आप लोग थोड़ा दिमागदार लोग होंगे। मुगालता हो गया। पता नहीं कैसे-कैसे लोगों से पाला पड़ रहा है इन दिनों। आप कहीं वहीं तो नहीं, जो दिल्ली में 'एंटी स्मॉग गन' देख कर और भविष्य को भी ऐसी मशीनों से बचाने के लिए कृत संकल्प हैं। वैसे किस कंपनी का एयर प्यूरिफ़ायर है आपके घर? एम आई या केंट का हेपा प्यूरिफ़ायर, हेमा मालिनी जिसका विज्ञापन कर रही हैं? अच्छा, फ़िलिप्स का है।

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