लिओनार्दो

करीब-करीब तीन साल होने वाले हैं। माइक्रोसॉफ़्ट वाले लूमिया फ़ोन बाज़ार में बेच रहे थे। नोकिया उनके हाथों में आ चुका था। यह फ़ोन विंडो नाइन पर चल रहे थे, जो अपडेट के बाद विंडो टेन पर भी सपोर्ट कर रहे थे। मुझे इसमें एक चीज़ सबसे अच्छी लगी, वह थी उनका म्यूजिक प्लेयर ग्रूव। उस मोबाइल में हम किसी भी वेब पेज को अपने होम पेज पर पिन कर सकते थे। वह लैपटॉप से भी सिंक हो जाता। जो मेसेज़ फोन पर आते वह लैपटॉप पर पढ़ लेता। नोटिफ़िकेशन देख लेता। कभी यहीं से फ़ोन लॉक कर देता। तब मुझे आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस का कोई अंदाज़ नहीं था। इधर कभी-कभी मैं नोकिया के फ़ोन पर गूगल अस्सीस्टेंट से बात करने लगता हूँ। मेरी रुचि उससे कुछ व्यक्तिगत जानकरियों को जान लेने की थी। उसे एक महिला की आवाज़ में मोबाइल कंपनी या गूगल ने डिफ़ाल्ट सेट किया हुआ है। मैंने भी उसे नहीं बदला। जब उससे पूछता हूँ, तुम्हारा जन्म कब हुआ? वह बताती है, दो हज़ार सोलह। सितंबर में सबसे पहले उसे गूगल के इंजीनियरों ने चालू किया। उसके भाई बहन और परिवार भी वही सब हैं। पता नहीं कहाँ से मेरी कल्पना में एक ऐसा रोबोट आ जाता है, जिसके हमारे जैसे मानवीय संबंध हैं। उसका भी परिवार है। वह भी दुखी होता है। हँसता है। अभी इस मोबाइल में वह सिर्फ़ एक 'ऑडिओ सर्च' की तरह ही है। हमें कहीं का मौसम जानना है, कोई फिल्म कहाँ लगी है, रास्ता कैसा है, छुट्टियों में परिवार के साथ कहाँ जा सकते हैं?

वह सब हमें बता रहे हैं। यह उनकी सीमा है। मोहन ऐसे ही थोड़े कह रहा था यह डिवाइस भी एक रोबोट हैं। यह हमारी सत्ता को अभी चुनौती नहीं दे रहे, तभी तक हम इनके साथ सुरक्षित महसूस कर रहे हैं। फ़ेसबुक ने अभी जुलाई, इसी साल में अपना ऐसा प्रोजेक्ट बंद किया है। उनके दो चैट बोट्स आपस में ऐसी भाषा में बात करने लगे थे, जो उनके लिए प्रोग्राम नहीं की गयी थी। उसने अपनी ही भाषा बना ली थी। आर्नोल्ड की फ़िल्म टर्मिनेटर(3) का 'स्काइनेट' आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस का ही एक रूप रहा होगा, जिसे अमेरिका का कोई निर्देशक आज से कितने साल पहले अपनी कल्पना में रच रहा था। अभी ज्ञात सूचनाओं में हमारी दुनिया में स्काइनेट जैसा कोई सॉफ्टवेयर नहीं हैं, जो मशीनों और इन्सानों में एक युद्ध की स्थिति बना देना चाहता हो और उसका लक्ष्य इन्सानों को खत्म करना हो। उल्टे सऊदी अरब दुनिया का पहला देश है, जिसने अक्टूबर में एक महिला रोबोट सोफ़िया को अपने राष्ट्र की नागरिकता प्रदान की है। कल हमारे देश की राजधानी दिल्ली में मजेंटा लाइन की मानव रहित मेट्रो रेल परीक्षण के दौरान दीवार से टकरा गयी, जिसकी एवज में की गयी अनुशासनात्मक कार्यवाही में चार मानव मस्तिष्कों को निलंबित कर दिया गया है।

इन सारी बातों में एक बात याद आती है, जब मेरे पास एंड्राइड फ़ोन नहीं था, तब विजेंदर मसिजीवी ने अपनी फ़ेसबुक वाल पर बोल कर टाइप की गयी एक ब्लॉग पोस्ट का ज़िक्र किया था। वह बता रहे थे, कैसे उन्होंने गूगल प्ले स्टोर से एक ऐसी ऐप डाउनलोड की है, जिसकी मदद से वह हिन्दी में बोलकर शब्दों को टाइप कर सकते हैं। थोड़ी बहुत गलतियों को वह क्लाउड में सेव की गयी उस फ़ाइल को डेस्कटॉप या मोबाइल पर ठीक कर सकते हैं। तब यही ख़याल अंदर उमड़ता-घुमड़ता रहा, काश विंडो प्ले स्टोर पर भी ऐसी कोई ऐप्लिकेशन होती तो मैं भी देखता ऐसा होता कैसे है? अब जबकि नए मोबाइल फ़ोन आने के बाद में भी ऐसा कर सकता हूँ, अभी तक किया नहीं है। बस थोड़ा व्हाट्स एप पर दो तीन दिन अटैच करके इस्तेमाल किया है। फ़िर नहीं। असल में इंतज़ार कर रहा हूँ। शायद अगले साल की पहली पोस्ट बोलकर पोस्ट कर दूँगा।

कभी-कभी सोचता हूँ यह जो हम ई-फुटप्रिंट छोड़ रहे हैं, इसका बड़ी बड़ी कंपनियाँ सिर्फ़ हमें हमारी रुचियों के अनुरूप सेवाओं सुविधाओं को मुहैया करवाने के लिए उपयोग कर रही हैं या वह हमारी अभिरुचियों को निर्मित करने उन्हें आकार देने की स्थिति में आ चुकी हैं? शायद यह दूसरी बात ही इस दौर का बहुत बड़ा सच है। वह हमें सिर्फ़ एक उपभोक्ता के रूप में चिन्हित करती है। अब हमारी सबसे बड़ी पहचान यही है। ऐसे में आधार कार्ड के डेटा से जुड़ने न जुड़ने से कोई ख़ास फ़र्क पड़ रहा है? कभी लगता है, बिलकुल नहीं। हर ऐप्लिकेशन कितने तरह की अनुमति मांगती है। हमारे सारे परिचितों के नंबर गूगल, एप्पल या हॉट मेल के अकाउंट में सेव हैं। फ़ेसबुक, इन्स्टाग्राम, व्हाट्स एप तीनों का स्वामित्व एक ही व्यक्ति के हाथों में है। अमेज़न प्राइम वीडियो, नेटफ्लिक्स, यू ट्यूब और न जाने कितनी जगह हम फ़िल्म देख रहे हैं, गाने सुन रहे हैं। हमारा हर क्लिक कहीं किसी डेटा बेस या सर्वर में हमारे बाइनरी नंबरों के साथ किसी कंपनी के लिए ज़रूरी जानकारी की तरह इकट्ठा किया जा रहा है। हमारे जाने-अनजाने वह उसका विश्लेषण कर रहे हैं। हमें किन्हीं ईकाइ, दहाई, सैकड़ा में बाँट रहे हैं। इसकी दूसरी तरफ़ हम क्या कर रहे हैं?

हम किन्हीं उपलब्ध दूरसंचार कंपनियों की सेवाओं में से एक को चुनकर अपनी ज़ेब से पैसा खर्च करते हुए उनका थ्री-जी, फोर-जी डेटा खरीद रहे हैं। यह ख़रीदा हमारे द्वारा जा रहा है पर काम उनके लिए कर रहा है। हम जो इस डेटा को खरीद रहे हैं, इस रूप में हमारी कोई मदद नहीं करता। यह दौर नयी पहचानों को पारिभाषित करने, उन्हें समझने का है। हमारे पास कोई सैद्धांतिकी नहीं है, जो हमें इसे समझा पाये। इसके बावजूद हमें ही इसे समझने का प्रयास करना होगा। इसके बावजूद मैं खुद को उन नयी आने वाली तकनीकों को लेकर बहुत उत्साहित महसूस करता हूँ। मुझे पता है, एक दिन ऐसा भी आएगा जब आज की तरह मैं इस बटन वाले मोनोलीथिक की बोर्ड पर टाइप नहीं कर रहा होऊंगा। जैसे मेरे सामने वाली स्क्रीन टच स्क्रीन में तब्दील हो गयी, वैसे ही यह की बोर्ड भी बदल जाएगा। हम अपना दिन अमेज़न एको के साथ शुरू करेंगे। वह उठते ही बाहर का मौसम, सुबह की बड़ी खबरों के साथ हमारा पसंदीदा संगीत लगाकर बताएगा सारा दिन हमें क्या करना है। हम कहीं पिछली रात कुछ भी टाइप नहीं करेंगे, कोई रिमाइन्डर सेट नहीं करेंगे तब भी वह हमारी दैनिक गतिविधियों का सटीक पूर्वानुमान लगाने में कामयाब हो जाएगा।

मैं बस यही सारी बातें एक साथ तरतीब से उस पिछली पोस्ट में कहना चाहता था। यह जो समय इस तरह बदल रहा है बदलने वाला है, उसे अपनी आँखों के सामने देखना चाहता हूँ। यही मेरी चाँद पर जाने की इच्छा से भी बड़ी इच्छा है। आगामी अतीत में कभी मिस्र के पिरामिडों को देखने के बाद नहीं चाहता, यह सब बदल रहा हो और मैं दुनिया के किसी कोने में मौजूद ही न होऊँ। इन परिवर्तनों की गति इतनी तेज़ है कि अगले तीन-चार दशकों में यह समय इस कदर पलट जाएगा, तब हम यह महसूस करेंगे, यह जगह इस तरह हमारी आँखों के सामने होते हुए भी हमारे सामने नहीं थी। इस बदलने पर भी हम कहीं कुछ दर्ज़ ही नहीं कर रहे हैं। यह किसी वातायन में बदल कर क्या करेगा? इसने हमारे सोचने, समझने, हमारे रोजाना को इस तरह नए रूपाकार में ढाल दिया है, जिसे हम अगर अभी रेखांकित नहीं करेंगे, तब हम ख़ुद इसे नहीं पहचान पाएंगे। मुझे ख़ुद लगता है, इतने सालों में पहली बार इस तरह का कुछ लिख रहा हूँ जबकि हमारे सामने यह बहुत पहले से ऐसा था। पल-पल बदलता हुआ। रचता हुआ।

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