हासिल

एक संख्या अभी कुछ घंटों के फासले पर साल भर की दूरी बन जाएगी। जब भी हम याद करेंगे कहेंगे, पिछले साल की बात है। आज की नहीं है। यह जो व्यवस्था है, इसी में हम सब ख़ुद को समेट लेते हैं। मैं भी इन बीते दिनों का हासिल जान लेने की गरज से बैठ गया हूँ। इन तीन सौ पैंसठ दिनों में जो बारह महीने बिखरे हुए हैं उनमें से कौन-कौन से दिन, कौन से पल, कौन से क्षणों को अपने कल के लिए ले साथ चलूँगा। यह जितना अंकों में विभाजित लगता है, उतना है नहीं। सब जोड़ रहे होंगे। उनके दुखों के अनुपात में सुख कितने रहे? कौन सी इच्छा अभी तक सिर्फ़ इच्छा ही बनी रह गयी? कितने सपनों को वह देख पाये, जो उँगलियों से भी आगे जमा होते रहे? मेरे पास इन सब विचारों के बीच कौन सी अनुभूतियाँ हैं, जिनमें यह साल बिखरा हुआ है? यह एक सपाट साल होता। अगर मैं पत्थर होता। कई सारी चीजों को तय किया था। ख़ूब लिखना है। उससे भी ज़्यादा पढ़ना है। कई बड़ी जगहों पर अपने लिखे हुए पर्चे, शोध से संबन्धित लेख भेजने हैं। हो सके तो थोड़ा-बहुत घूमना है। गाँव जाना है। वहाँ पीएचडी का डेटा इकट्ठा करना है। इन सबमें फरवरी वहीं था। गाँव में। चाचा एकदम ठीक हैं। ढाबली पर बैठते हैं। डॉक्टर से दवाई लेते हैं। बाबा अभी भी गाँव जाते हैं। वहाँ सबके लिए जल चढ़ाते हैं। सारा सारा दिन कुर्सी पर बैठे रहने से पैर में सूजन रहती है। बहुत सारी बातें एकदम दिमाग में दौड़ने लगती हैं । जैसे एक बारगी में ही सबको लिख जाऊँ।

कभी ख़ुद को कहीं भी जताता नहीं हूँ। पता नहीं यह क्या है। नहीं जताते हुए भी मुझे पता है, किसी के अस्तित्व के लिए ज़रूरी हूँ, ऐसा कभी उन्हें एहसास नहीं होगा। यह बिन दखल दिये सामने रहते हुए न रहने जैसा है। मैं मोहित से बात नहीं किया करता था, ऐसा भी नहीं है। हमारी बात कभी-कभी ख़ूब लंबी-लंबी चली जाती। मार्च में उसके परिवार को गए एक साल हो जाएगा। उनकी उपस्थिति में जो एक भरापन था, वह उस कोने से अब अनुपस्थित है। उस टीन के नीचे जाकर बैठने से अभी भी लगता है, वह घर यही छूट गया है। अभी कोई अंदर से निकल कर आएगा और मैं चुपचाप वापस लौट आऊँगा। हर बार इस उम्मीद से वहाँ बैठता हूँ। हर बार कोई नहीं आता । सोचता हूँ जब राहुल आता है या उसकी बड़ी बहन आती है, वह जब आते होंगे, वह सब अब उस जगह को कैसा पाते होंगे? जब एक दिन हम यहाँ से चले जाएँगे, हमारे भीतर कैसा भाव घर कर जाएगा?

फ़िर सोचता हूँ, इस साल मई जून आया ही नहीं होता। गाँव से लौट कर भाई ने बताया, चाचा अब पहचान में भी नहीं आ रहे। पता नहीं क्या हो गया। जब से बवासीर का ऑपरेशन करवाया, तब से हालत ऐसी हो गयी है। यह वाक्य लिखते हुए एक पल के लिए रुक जाता हूँ। सोचता हूँ, अतीत में वापस लौट जाने की कोई तरक़ीब मेरे पास होती, तब सर्वेश शुक्ला के यहाँ जाने से पहले ही उन्हें दिल्ली आने वाली गाड़ी पर बिठा देता। कितनी बार तो पापा ने कहा, यहाँ आ जाओ। यहाँ डॉक्टर को दिखाएंगे। देखते हैं, वह क्या बताते हैं। पर वह दिल्ली नहीं आए। वहीं इलाज कराते रहे।

उस दृश्य की कल्पना कीजिये, जहां हमें सब पता है, चाचा को क्या हुआ है और हम चुपचाप किसी घुन्ने शातिर चोर की तरह चुप्पी लगाकर उस पूरे सफर में सिर्फ़ इतना बताकर अपनी दोनों चचेरी बहनों को दिल्ली से लखनऊ ले जा रहे हैं कि चाचा का ऑपरेशन होगा। उन्हें कुछ भी नहीं पता है, चाचा को क्या बीमारी है? आगे क्या होने वाला है। लखनऊ पहुँचकर कर हम सीढ़ियाँ चढ़कर पहली मंजिल पर आ गए हैं। सामने अँधेरे से उजाला होता है, एक कृशकाय देह में चाचा सिमटे बैठे हुए हैं। वह हमारा इंतज़ार कर रहे हैं। सच उन्हें अब पहचानने के लिए मुझे अपनी स्मृति से वह सारे पन्ने हटा देने पड़े, जहां मैंने चाचा को देखा हुआ था। यहाँ पापा ने कहा चाचा की कुछ तस्वीरें खींच लाना। वह भी देख लें, कैसे हो गए हैं चाचा। फरवरी में बहन की शादी है। चाचा की ऐसी हालत में वह कैसे उस दिन को अपने मन में देख रही होगी। दुख और सुख के दिन साथ-साथ चल रहे हैं।

इसी भाव में डूबते हुए सब भूलने की कोशिश करता हूँ। जैसे यह बात मुझे कभी पता ही नहीं चली हो। पर ऐसा हो कहाँ सकता है। इसी सब में उबरते हुए अपनी डायरी को किताब की शक्ल में ढालता रहा। उन्हें पंक्ति दर पंक्ति देखता रहा। छिंदवाड़ा जाते हुए रेल की वह शाम भी बहुत याद आती है। कहीं भेजने से पहले सब देख लेना चाहता हूँ। यह भी एक सपना थी। साल ख़त्म होते-होते सपना ही रह गयी। बस राकेश के यहाँ जाने की जो इच्छा थी, वहीं पहुँच सका। वहाँ जाकर लगा, दुनिया लघुता में ही बची रहेगी। जो जितना छोटा बनकर रहेगा, उसके बचे रहने की संभावना उतनी ज़्यादा है। यह शहर भी है और कस्बा भी। यह संक्रमण को उस ताप से महसूस न होने देने वाला कोई भाव रहा होगा। यह लघुमानव की परिकल्पना जैसा है, पर इसके लिए जीवन की कई जटिलताओं को पहले जान और समझ लेना होगा। तभी हम कुछ कर पाएंगे। यह भागते हुए ज़िंदगी को टुकड़ों में नहीं, उसे एक करके ही समझा जा सकता है। यह कुछ कुछ चुपचाप स्पर्श करते रहने जैसा है। उसके रेशे-रेशे को इतनी पास से देखते रहने जैसा।

यह सब कहते हुए बराबर मुझे लग रहा है, बहुत सारी बातें उस क्रम से नहीं आ पा रहीं, जैसा मैंने उन्हें मन में सोचा था। उसके साथ यह भी सच है कि चाहता हूँ यह अनुभूतियाँ याद न रह पाएँ। यह उसी तरह बिखर कर रह जाना है, जैसे हर बार लखनऊ पहुँचकर हम उस मृत्यु को थोड़ा और कुरेद देते। अभी चाचा सामने हैं। कुछ महीनों बाद नहीं होंगे। यह जो नहीं होना है, यही इस साल का हासिल है। जिसे कोई भी अपने पास रखना नहीं चाहता। इसी में यह साल दिल पर खुद जाएगा, कभी सोचा नहीं था। इस ऊबड़ खाबड़ में यही बचा रह गया है। अनचाहा। अस्वीकार्य।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

बेतरतीब

आबू रोड, 2007

हंस में आना

शहतूत आ गए हैं: मेरी पहली किताब

हिंदी छापेखाने की दुनिया

जगह

वापसी