ओट

अब जबकि यह पंक्ति लिख रहा हूँ, मैं वहाँ नहीं हूँ, जहां से इन्हें लिखने की चाह सबसे पहले मेरे अंदर आई थी। वहाँ से लौटकर यहाँ आए एक हफ़्ते से भी ज़्यादा हो गया है। पाँच दिन बाद से यह दिन थोड़े और बड़े होने लगेंगे। पर इधर मेरे अंदर अँधेरा बढ़ रहा है। सब दिख रहा है। सिर्फ़ आने वाले दिनों को नहीं देख पा रहा। वह किसी सुकुमार फूल की तरह कहीं हैं, इसका आभास भी मुझे आश्वस्त नहीं कर पा रहा। ख़ैर, बात दूसरी तरफ़ न मुड़ जाये, वापस लौटते हुए बस इतना ही कहना चाहता हूँ, यह स्याह दिखने वाली परिघटना, जिसमें सब कहीं खो जाता है, इसी वजह से एक चाचा के यहाँ से दूसरे चाचा के यहाँ नहीं जा पाया। सोचता, शाम के चार बज गए हैं, अभी निकलुंगा, तब दस मिनट में वहाँ उनके घर पहुँच जाऊंगा, तब थोड़ी देर में ही वहाँ से लौट आना होगा। अँधेरा होने से पहले। रोज़ यही खयाल हर बार उसी वक़्त मेरे अंदर घर कर जाता, जब सूरज डूबने में यही कोई घंटा डेढ़ घंटा होता। मैं पुराने दिन के रूमान में चाचा की गाँव वाली दुकान पर रखे उस लकड़ी के मेज़ पर बैठा, वहाँ सौदा लेने आने वाले लोगों को अपने भाई-बहनों के साथ देख रहा हूँ और उस तपती हुई दुपहर की तरफ़ बढ़ते हुए कई लोग किसी बात में उलझे हुए वहीं थम से जाते। बात कहाँ से शुरू हुई और कहाँ जाकर खत्म होगी, इसे बिन सोचे वह बस अपने हिस्से की छोटी सी बात कहते रहते। यह भाव, इसकी अनुभूति कितने साल में मेरे अंदर बनी है, इसका कहीं कोई हिसाब नहीं है। स्मृति में भी कोई याद कहीं टाँकी हुई नहीं होगी। यह बताशे से लेकर गुड़ की भेली से शुरू हुई मानी जा सकती है।

इन जैसी कितनी ही बातों को याद करते-करते इस बीच न जाने कितने ही साल हमारे सामने पिघल गए। मैं सिर्फ़ इसी क्षण को दोबारा अपने सामने घटित होते हुए देखने की इच्छा से भरा हुआ रहता। कभी अकेले उस खड़ंजे पर जाने की इच्छा को इतना नहीं कर पाया कि चल पड़ता। इस तरह दिन ढल जाता और रात हो आती। अभी भी जो बात मैंने शुरू की थी, वह इस याद की ओट में कहीं छिप गयी है। मुझे पता है। तब भी क्या कर पाया? कुछ नहीं। बह गया। हो सकता है, अंधेरे के बहाने से इसी बात को कहना चाहता होऊंगा। पता नहीं। अब मन नहीं है। अनमना लिख नहीं पाऊँगा।

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