इतवार

हफ्ते में एक यही दिन है, जिसका इतिहास हम सब अपने भीतर हर इतवार लिख रहे होते हैं। बहुत सी यादें बेतरतीबी से हमने इस दिन के साथ जोड़ कर रख ली हैं। यह हमारे स्मृति कोशों में सबसे यादगार पलों को अपने अंदर समेटे हुए है। जब भी इन दिनों जिनमें, नवंबर सूरज के साथ इन सुनहरी दोपहरें ले आता है, अपने अंदर हम खो रहे होते हैं। हम छत पर चारपाई डाले अलसाए से बैठे हैं। मूँगफलियाँ अभी निकली नहीं हैं। तिल पट्टी पापा लाये थे, मिल नहीं रही। तब भी वहीं पीठ किए ऊँघते रहने में अपना सुकून है। खाना खाकर कुर्सी पर बैठे किसी मेहमान का इंतज़ार कर रहे हैं। वह आज आने वाले हैं। अभी तक नहीं आए। पर कहा तो आज ही था। आखिरी इतवार आपके यहाँ आऊँगा। शायद भूल गए होंगे। नहीं, भूलते नहीं हैं। चलो, नहीं आए हैं तो आ जाएँगे। कितनी सारी बातें इन सर्दियों में आए मेहमानों की शुरू हो जाती हैं। जब नया टीवी लिया था, तब गाँव से चन्द्र्भान आए थे। तब ठंड थोड़े थी। ठंड नहीं थी, तब क्या? इतवार तो था। अपने इतवारों को याद करता हूँ, तब वह अरुण के यहाँ तक जाती हैं। कितने ही इतवार हम दरियागंज होते हुए लाल किले के परकोटों में बैठे रहे। एक-दूसरे की किताबों को उलटते-पुलटते वह दिन कहीं पीछे छूट गए। कितने ही लोग हमारी आँखों के सामने गुज़र जाते। हम अपने-अपने भावों से उन्हें देखते और अपनी बातें करते रहते। उन बातों में आने वाले किसी पर्चे को कायदे से देने की हिदायतों के साथ-साथ पता नहीं कौन से अनदेखे भविष्य की बातें रही होंगी, जिस तक हम अभी भी पहुँच नहीं पाये हैं।

उन भविष्य के नक्शों में हम शायद गलत जगह से चलना शुरू करते हैं। इससे भी पहले की यादों में हमारे इतवार किसी जलसे में बीता करते। इन कम सर्द दुपहरों में हम सपरिवार प्रीति भोज में जाते। वह भी क्या दौर था। याद करते ही चूनामंडी(पहाड़ गंज) आर्य समाज याद आती है। कैसे व्याख्यान हुआ करते थे। हनुमान रोड भी इसी लिए मेरे मन में हमेशा के लिए अंकित हो गयी है। अब यह जलसे एकदम उदासी की तरह छाए हुए हैं। बूढ़े लोगों की उपस्थिति इतनी कम है कि उंगली पर गिन लो। युवा अनुपस्थित हैं। फ़िर जिस तरह से यह संस्था दक्षिणपंथी राजनीति से कदमताल कर रही है, देख कर आश्चर्य होता है। इस बात पर तो बात करने का भी मन नहीं करता। एक दिन आएगा, जब इस पर कुछ लिखुंगा।

अभी बस इस इतवार को देख रहा हूँ। आज का हासिल क्या है? दस बजे नहाकर लौटा, तब जो क्रिकेट देखना कब का छोड़ दिया था, उसी में पुणे टेस्ट की भारतीय बल्लेबाजी देख रहा हूँ। खाना खाकर डेढ़ बजे जो लेटा, यह दोपहर सारी ढल गयी। अब आठ बजने को है। सब इस दिन के इतमीनान में डूब रहे होंगे। अपनी रिक्तताओं को इसी एक दिन से भर रहे होंगे। इस दिन का अवकाश, हम सब अपने अपने अंदाज़ में बुनते हैं। यह दिन भी इसी तरह हमें बुनता है। हफ़्ते का वह दिन, जब सब इस छुट्टी से भर जाना चाहते हैं। हम उन इतवारों को सबसे ज़्यादा मिस करते हैं, जब शाम चार बजे की कोई फिल्म आने वाली होती थी और हम सब इकट्ठा होकर उसे देखने बैठ जाते। और पता है, इसमें भी वह पल सबसे तीव्रता से अपनी ओर खींचते हैं, जब सड़क से गाड़ियों की आवाज़ एकदम बंद हो जाती। यही पहली बात है, जिससे हम किसी दिन छुट्टी की गहराई मापा करते। जिस दिन सबसे कम गाडियाँ, उस दिन सबसे अच्छा इतवार। पर अब यह सब उलट चुका है। अब कोई इस दिन घर रहना ही नहीं चाहता।

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