रात ख़याल

रात इसी तरह मेरे अंदर होकर गुजरती है। स्याह। काली। अँधेरे से भरी। उसके हर गुजरते पल में अपने अंदर टूटते हुए बस बिखरने से बचने की फ़िराक़ में लिखना छोड़ दिया है यह सब। यह छूटना मेरे अंदर छूटा नहीं। स्थगित हो गया। अभी कुछ देर पहले, बस इस पर सोचते हुए यही लगा कि ऐसा होने से क्या हुआ होगा मेरे भीतर? शायद यह मेरा खुद से बचने का तरीका है । मैं खुद को उन सब स्थितियों से बहुत अलग कर लेना चाहता हूँ और अभी भी ऐसी किसी बात का ज़िक्र नहीं करना चाहता, जो मेरे अंदर खुद को बुन रही है। यह मेरी सीमाओं को टटोलने जैसा बिलकुल नहीं है। असल में इसमें कुछ दम ही नहीं है। बात सिर्फ़ इतनी है, रात के इन पलों में तुम्हारी कमी को इतनी पास से देख रहा होता हूँ। यह रात ही है, जब मेरे अंदर का कोलाहल एकदम इस अँधेरे में डूब रहा होता है। रात में अँधेरे जैसी फैली शांति में कुछ ऐसा है, जो मुझे किसी खोल की तरह लगता है। मैं ख़ुद को इन पलों में बहुत निकटता से देखना चाहता हूँ। बहुत पास से देखने पर हर बार तुम ही नहीं मिलती । हर बार तुम्हारा गैर-मौजूद रहना, मेरे बिखरने को रोक नहीं पाता। यह जो बहुत असपष्ट अधूरी सी बातें हैं, इनके बहुत से तफ़सरों को बिंबों में कहा जा सकता है। कई और शैलियों से उसे लिख सकता हूँ। पर अगले ही पल सोचता हूँ, क्या होगा लिखकर? इस तरह दूसरों को जिस वजह से लिखने के लिए कहता हूँ, उसी वजह को अपने अंदर मरने के लिए छोड़ देना बहुत असहज कर देता है। ख़ुद से कुछ नहीं कहना चाहता। कहने में वह कहना वैसा नहीं होगा, जैसा मेरे अंदर है।

कुछ न कह कर भी मेरी इन पंक्तियों में कुछ तो होगा, जिसे पढ़ने वाला महसूस करेगा। जैसा मुझे लग रहा है, वैसा नहीं, पर थोड़ा बहुत तो वह भी बेचैन होकर मेरी तरह सोचने लगे। आख़िर किन वजहों से ऐसी बातें कर रहा हूँ। शायद यह कुछ अनर्गल मांग है। एक भाषा जिसे मैंने गढ़ा था, उसी में अब कुछ न कह पाने वाला कौशल मैंने ही ख़ुद के लिए अर्जित कर लिया है। जो भावातिरेकों में कह जाना था, उसे स्थगित कर देने जैसा। कहने को होता हूँ। पर रात ज़्यादा हो गई यही सोच लेट जाया करता हूँ। जिन पलों में जिन तरहों से ख़ुद को रख देता था, वह बिलकुल भी वैसा नहीं रह गया। यह मेरे आत्म-केन्द्रित होते जाने से भी ज़्यादा मेरे अंदर उन अवकाशों को किन्हीं दूसरी दिशाओं में न मोड़ पाने की अक्षमता है। इस तरह सोचते हुए कभी-कभी लगता है क्या बचा रहेगा? मेरे अनुभवों में इतनी पुनरावृति, दोहराव, इकहरापन है, जिसे न लिख कर भी ढक नहीं पा रहा। यह ऊब जाना नहीं है। यह तिल-तिल कर मरते जाना है। जहाँ से मैं एक पल के अंतराल के बाद अनुपस्थित हो जाना चाहता हूँ, उन्हीं परिस्थितियों में लिथर रहा हूँ। वह दुख कीचड़ की तरह मेरे पैरों में सन गया है। जिन दिनों की कल्पना कभी मेरे मन ने नहीं की थी, उन्हीं में हर बीतता पल बीत रहा है।

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