डायरियाँ

उस रात फोन पर बात करते हुए सिर्फ़ अपनी कहीं पुरानी बात दोबारा दोहरा रहा था। कभी कागज पर अपना लिखा हुआ पढ़ने की इच्छा मुझमें नहीं बची। यह इच्छा से अधिक उस लिखे हुए से घृणा जैसे भाव का मेरे अंदर भर जाना है। यह किस तरह का लिख रहा हूँ, जो मुझे किसी भी तरह की ऊर्जा से भर नहीं रहा। मैं जब भी कोशिश करता हूँ एक दो पंक्तियों से अधिक नहीं पढ़ पाता। पिछली दोनों डायरियाँ मेरे सामने अलमारी में रखी हुई हैं। एक शाम मन किया, ज़रा देख लूँ। क्या लिखा गया है उन बीतती घड़ियों में? एकदम से मन उचट गया। इसे किस तरह लेना चाहिए? मैं जो जी रहा हूँ, उसे ही लिखने की कोशिश करता हूँ। जितना लिख पाता हूँ, उसमें मेहनत से ज़्यादा उन क्षणों को अपने अंदर दोहराते रहने की पीड़ा मुझे संताप से भर देती है। यह कैसे दिन हैं, जो अतीत में भी हुबहू वैसे ही थे, जिनमें बीत रहा हूँ? उनमें ऐतिहासिक रूप से अलग समय बोध है, मगर परिस्थितियों में कोई अंतर नज़र नहीं आता।

ऐसा क्यों हुआ होगा? इसे समझने की ज़रूरत है। यह लिखने का कारण और उस लिखे जाने के बाद न पढ़ पाने की प्रक्रिया को विस्तार से कह जाने के बाद ही कुछ रेशे पकड़ में आएंगे। ख़ुद से पूछना चाहता हूँ, ऐसे पलों को लिख ही क्यों रहा हूँ, जो मेरे अंदर इस तरह जुगुप्सा भर देते हैं? इसका एक मार्के का जवाब अभी दिमाग में कौंधा। शायद उन्हें कभी नहीं पढ़े जाने के लिए इस तरह कह रहा होऊंगा। यह ऐसी व्यवस्था का बन जाना है, जिसमें एक बार लिख देने के बाद किसी भी तरह से उन बातों के जुड़ाव महसूस नहीं होता। जुड़ाव महसूस न कर पाना उन्हें खत्म नहीं करता। मेरे अंदर मेरे बाहर वह बिलकुल वैसी की वैसी बनी रहती हैं। उनको जितना भी लिखने की कोशिश करता हूँ, वह उसके छटांक भर ही पन्नों पर छिटक पाता है। उसका बहुत बड़ा हिस्सा अवसाद और उसकी परछाईं बनकर मेरे इर्दगिर्द बना रहता है। लिख लेना किसी लड़ाई लड़ने से कम भले न हो। जब यह लड़ाई ख़ुद से हो तब इसके अर्थों में जो व्याप्ति है, उसके बावजूद लिख लेना दवाई की तरह एक दिन काम करना बंद कर देता है।

यह सिर्फ़ इन दो डायरियों की बात नहीं है। वह सारे पन्ने, जिन्हें डायरी कहा करता हूँ। वह मेरे दुख के हिस्सेदार हैं। उनमें सबसे ज़्यादा ईमानदारी से अपनी बातों को कहा है। जबकि वह मेरी अनुपस्थिति के बाद भी मौजूद रहेंगे, तब उनका अर्थ भले कोई कुछ भी लगाए, मेरे लिए वह निरर्थक होंगे। वह लिखा हुआ अपने आप को बचाए रखने की काबिलियत रखता है। उसे उसके लेखक की पैरवी की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। उनमें उनके लिखे जाने पर बहुत बात कर चुका हूँ। वह बातें इसलिए भी बची रहेंगी। उनका बचे रहना बिना किसी रेशे को उधाड़े संभव नहीं है। बस यह याद रखना।

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