मुक्तिबोध को भूलते हुए

आगे लिखी पंक्तियाँ किसी दबाव में नहीं लिखी गई हैं। बस लिख दी जा रही हैं। मन किया जो भीतर चल रहा है, उसे कह दिया जाये। जिसके पास होने से यह लिखना अभी तक मेरे अंदर बचा हुआ है, उसे आखिरी बार पढ़ने के इतने सालों बाद भी वह आज कहाँ है? इस पूरी प्रक्रिया में खुद को ही स्थित कर रहा हूँ। एक कवि जिसे हम कवि की तरह नहीं, अपने में उग आई खिड़की की तरह देखने लगते हैं, क्या एक ऐसा वक़्त भी आता है, हम जिसे इतनी पास महसूस करते रहे हों, उसे भूलने लगते हैं? यह भूलना असल में भूलने की तरह नहीं है। इस भूलने में उसका पीछे की तरफ़ खिसक जाना है। मेरा मन अभी उसे कहीं देख नहीं पा रहा। वह कहाँ है अभी। इतना पता है, वह कहीं दिमाग के पिछले हिस्से में मेरे इन दिनों के बोझ में दब गया होगा। यह मुक्तिबोध के साथ होगा, ऐसा लगता न था। पर आज इस पल सोचने पर यह ऐसा ही लग रहा है।

पता है, मुझे सबसे उनकी सबसे अच्छी तस्वीर कौन सी लगती है? जिसमें वह पति-पत्नी दोनों हैं। वह शायद खड़े हुए हैं या बैठे हैं, अभी याद नहीं आ रहा। शायद बैठे हुए हैं। कल संजीव सर ने 'चाँद का मुँह टेढ़ा है' कविता संग्रह की सन् इक्कयासी में छपे सातवें संस्करण की तस्वीर लगाई। मेरे पास न ऐसी कोई इतनी पुरानी किताब है, न ऐसी कोई तस्वीर है।

ख़ैर, मैं बहुत दिनों से सोच रहा हूँ, उस तस्वीर में, जिसमें वह दंपत्ति साथ हैं, वह मुझे अपनी तरफ़ क्यों खींच रही है? शायद दोनों की सपनीली आँखें। उसका उनकी कविताओं से क्या संबंध? हो सकता है, आगे खींचकर मैं कोई सहसंबंध बना भी दूँ। पर उससे होगा क्या? क्या मैं अपने दांपत्य जीवन की कठिनाइयों को उन पर आरोपित कर दूंगा? पूँजी जो अपने अल्पतम् स्वरूप में मेरे सामने है, मैं उसके अनुपात में अपने दुखों को उतना ही बड़ा करके देखने लगूँगा। या एक क्षण बाद मुझे अपनी कही हर बात पिछली पंक्तियों की तरह झूठी लगने लगेंगी?

मेरे पास इसमें से किसी भी सवाल का कोई जवाब नहीं है। मेरे पास सिर्फ़ यह सवाल हैं। अब मेरे मन में इन सवालों और उसी अनुपात में आते जा रहे ख़यालों को किसी से बाँटने का मन नहीं करता। शायद कवि ऐसे नहीं होते होंगे। सचमुच उन्हें कहीं कहने का कोई मन नहीं है। जो कभी त्वरा में कह गया, उसकी बात अलग है। लेकिन अब यही सच है। यह जो अभी हम बात कर रहे थे, प्रति संसार की। बेचैनी की। उन बिंबों की। यह सब बातें अपनी जगह होते हुए भी। अपने रूप में होते हुए भी उतनी ही रूढ़िबद्ध हैं, जिनसे कोई कवि मरने के बाद भी बचना चाहेगा। यह किसी के साथ भी होगा, वह इसी इच्छा से भर जाएगा। यह बातें जितनी इस कवि की शैली पर नहीं हैं, जितनी मुझ पर हैं। मैं कोई कवि नहीं हूँ। बस इन दिनों लिखने वाला एक साधारण सा न लिख पाने वाला व्यक्ति हूँ। यह बात इसी रूप में महत्वपूर्ण हैं कि इसे लोग ईमानदारी नहीं चालाकी समझेंगे। मुझे उनसे कोई अपेक्षा नहीं हैं। मैं सिर्फ़ अपने और एक कदम बढ़कर अपने परिवार के प्रति ज़िम्मेवार हूँ। यह बाध्यता नहीं है। बस इसका रूपकार वैसा है।

यह मुक्तिबोध नाम का कवि हमें अपनी सारी स्थापनाओं, दृश्यों, कल्पनाओं, स्मृतियों, सपनों, प्रस्थान बिन्दुओं, वैचारिक आग्रहों से 'डिसलोकेट' कर देने वाला कवि है। हम उन कविताओं को पढ़कर, जो अक्सर हमने बहुत कम पढ़ी होती हैं, हमारे साथ यही करती हैं। हम उन्हीं दो-चार कविताओं के दायरों में ख़ुद तो सिमटते हैं। कवि भी उसी में किसी कोने में बैठा उकता सा जाता है। हमारा वितान इतना सीमित है। हम यह जानकार भी सचेत नहीं होना चाहते। क्योंकि उन्हीं पुरानी कही बातों से हमारा काम बख़ूबी चल रहा होता है। मैं ख़ुद के साथ इस तरह बाँध नहीं देना चाहता। इसलिए कहने को हूँ कि मैं उस मुक्तिबोध को भूलकर दोबारा देखना चाहता हूँ। धीरे-धीरे उस पढ़े हुए कवि को भूल जाना चाहता हूँ। भूलता हुआ यह कवि मुझे याद नहीं रखना, जो हमने एमए की कक्षाओं में ऊबे हुए प्राध्यापक साल-दर-साल उन्हीं ढर्रों पर पढ़ाते हुए हमें बता गए। हम हर कविता को 'फ़ैनटसी' से देखने का हुनर अपने अंदर बोते हुए रति के दृश्यों को देखने के आदी होते गए। यह मुहावरा हमें कुछ दिखाता नहीं। अपने में क़ैद कर लेता है। फ़िर होता कुछ नहीं। एक भोथरा सा औज़ार कब तक साथ देगा? हम अपनी नज़र नहीं बना पाये, यह दुख का विषय है। जो हमें कभी नहीं होता।

मैं ख़ुद से मुक्तिबोध में उतरने की इच्छा से भले भरा हुआ दिख रहा हूँ पर इस आख़िरी बात तक आते-आते मेरे मन के भीतर यह ख़याल नहीं आया कि कल मुक्तिबोध का जन्मदिन है, मुझे कुछ लिखना चाहिए। सोचा, दिन ऐसे ही गुज़र जाने देते हैं। आज भी इसलिए कह रहा हूँ, क्योंकि अब मुझमें नहीं लगता कि मैं कभी उस तरह इस कवि को अपने अंदर महसूस कर पाऊँगा। तब लगा, इस बात को लिख लेना चाहिए। यहाँ इसे याद के लिए लिख रहा हूँ। मुझमें स्मृतियों को भूलते हुए एक अभिव्यक्ति को याद करने की इच्छा का विरोधाभास इस कदर आ जाएगा, कभी सोचा न था।

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

बेतरतीब

आबू रोड, 2007

हंस में आना

शहतूत आ गए हैं: मेरी पहली किताब

हिंदी छापेखाने की दुनिया

जगह

वापसी