स्मृति

मैं दोबारा उस भाव से भर जाना चाहता हूँ, जब मेरे अंदर पहली बार तुम्हें छूने की बात उग आई होगी। उन्हीं स्मृतियों में वापस लौट जाने की इच्छाओं से भर गया हूँ। उन दिनों कैसे डूबे-डूबे रहते और शामें डूब जाया करती। यह जो बीते कल में वापस चले जाने की इच्छा है, वह इस निर्मम समय में ऐसे ही नहीं चली आई होगी। कोई कतरा मुझमें कम रह गया होगा, जिसे तलाशने वहाँ लौट जाना चाहता हूँ। यह इच्छा आज मुझमें है, कल तुममें हो सकती है। हो सकता है, यह कल तुममें रही हो और आज तुम्हारे जरिया मुझमें आ गयी हो। बस सोच रहा हूँ और किस बिम्ब से इस बात को कहा जा सकता है? इस सबमें एक रात ऐसी होगी, जब हम सब इसी तरह भर जाएँगे। यह छूना अपने अंतस को छूने जैसा होगा। जैसे छूएँगे, पानी जैसे अपने मन को। उसकी तरलता में जो नमी होगी, उसी में रखकर अपनी बात तुम तक पहुँचा दूंगा। वह शब्द किसी को दिखाई नहीं देंगे। वह स्पर्श की तरह मन पर अंकित होकर उसी में समा जाएँगे।

यह क्षण मेरे हृदय की सबसे कोमलतम अनुभूति बनी रहें और तुम तक इसी तरह वहाँ उतरती रहो। इस उतरने में न तुम अकेली रह पाओगी, न मैं। हम साथ-साथ उन ओस की बूंदों को अपनी हथेलियों पर रख कर अपने मन को धड़कता हुआ देख पाएँ। या ऐसा होता कि हवा के झोंकों में पत्ते बनकर उस ऊँची डाल से एक साथ इस पथरीली ज़मीन पर झूलते हुए उतरते। हमारे इन्हीं सपनों में दीमक लग गयी। यह द्रवित करने वाली पंक्तियों का अवकाश हमारी धमनियों में भर गया। यही सेंध है, जो नहीं लगनी थी। यह कार्बन की कठोरतम अवस्था से भी अधिक कठोर है। यह सपनों का सूख जाना है। यह सपनों का मिट्टी हो जाना क्या होता है, यह इन दिनों समझ रहा हूँ। यह शुरू से यहाँ तक की सारी बातें उसी तरह झूठ हैं, जैसे एक दिन हम चाँद पर फ़ोटो खिंचवा आए थे। मुझे क्षोभ है, मैंने एक झूठी बात से बात शुरू की और यहाँ इस आखिरी बात तक झूठ ही बोलता रहा।

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