मन

यह जो भाग लेने वाला मन है, कभी तो यह ओस की तरह दिख जाता है। यह ऐसा एक दिन में तो बना नहीं होगा। इसमें ऐसा क्या है, जो यह मुझे अपनी तरफ खींचे रहता है? इसके पीछे छिप जाने की आदत का क्या करूं? यह अपने अंदर मेरी सारी इच्छाओं को छिपाए हुए है। कोई देखे न देखे, वह वहीं सिमटी पड़ी रहेंगी। उनका किसी मेज़ पर अनपढ़ी किताबों की तरह रहना किसी को भी खल जाएगा। मुझे भी खलता है। इसलिए यह जो कहता है, कर लेता हूं। हर बार ऐसा करना आसान नहीं। फ़िर भी कुछ तो किया ही जा सकता है। सब कहते हैं, यह हममें से किसी ने देखा नहीं है। मैंने भी नहीं देखा, ऐसा नहीं है। इसे कई बार दृश्यों में देखता हूँ। उन दृश्यों में जिनमें मेरे कई सपने बंद हैं। वहाँ करने के लिए मेरे पास बहुत सारी चीज़ें हैं। जिन्हें इस ज़िंदगी में शायद ही पूरा कर पाऊँ। जैसे एक दृश्य में इस धरती को तुम्हारे साथ चाँद से देख रहा हूँ। इतनी ऊपर से देखते हुए भी अपने घर को पहचान जाना, हम दोनों को एक साथ आश्चर्य से भर देता है। उसी मन में एक और ग्रह पर जाने की तमन्ना है। हम इस पृथ्वी को छोड़े वाले आख़िरी मनुष्य हैं। हमारे जाने के साथ ही यह पृथ्वी अपने एकांत में डूब जाती है।

इन ख़यालों में सिर्फ़ भविष्य ही नहीं है। अतीत में मिस्र के पिरामिडों को अपने सामने बनता हुआ देखने की इच्छा भी है। उनके अंदर जाने की लालसा भी। मसोपोटामिया की सभ्यता को पास से जानने की एक लकीर बराबर इच्छा भी कहीं दबी रह गयी होगी। इन सबके बावजूद ठहर कर इन सारी पिछली पंक्तियों पर गौर करता हूँ, तब लगता है, मन और सपनों को एक में उलझा दिया है। पर दूसरे ही पल लगता है, इन इच्छाओं से ही हमारा मन बनता है। यह इच्छाएं ही इसे एक मूर्त रूप देती हैं। असल में यह इच्छाएं ही हमारा मन हैं। इन इच्छाओं को हम अपने अंदर कहीं स्थित करने की गरज से इसे मन में रखा हुआ मान लेते हैं। यह जो हम कहते हैं कि हम वही करेंगे, जो हमें अच्छा लगता है, इस मन की निर्मिति में पहला कदम है। हम अपने अतीत से लगातार एक खास शक्ल में ख़ुद को बुनते रहे हैं। सिर्फ़ हम ही नहीं हमारा परिवेश भी हमें तराश रहा होता है। हमें तब भी लगता है, हम अपने मन को बनाने वाले एक मात्र कारक हैं। यही मन हमें अपने से बाहर देखने ही नहीं देता। इसका यही एक काम है। बस एक।

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