यहां

शाम ख़त्म होने को है। यहां मेरे बगल से दो बंदर गुजर रहे हैं। एक के पीछे एक। शायद दोनों भाई होंगे। दोनों सड़क पार कर गए। एक साथ। मैं यहां आकर एकदम 'मिसफिट' हो गया हूं। जो भी मुझ से मिल रहा है, वह जानना चाहता है, मैं अचानक कैसे आ गया? अगर आया हूं, तब कोई न कोई काम तो ज़रूर होगा। वह मुझसे वह काम जान लेना चाहते हैं। वह लोग जो खुद यहां बेकार बैठे हैं, उनकी नजर में किसी और को बेकार नहीं बैठना चाहिए। यह मैं समझ रहा हूं। तब मैं यहां क्या कर रहा हूं? क्यों आया हूं यहां? यह कोई दार्शनिक सवाल नहीं है। उनकी जिज्ञासा है और मेरे लिए यह सब लिख पाने का बहाना भर। इससे ज़्यादा की मेरी हैसियत नहीं है अभी।

इन तीन दिनों में यह तो तय बात है कि उनके रोज़ाना में मेरे लिए कोई जगह नहीं है। हमारे घर भी कोई आता है, तब हम भी बिलकुल ऐसा ही करते। वह अपना रोज़ाना बना सकें, इतना मौका तो उन्हें मिलना ही चाहिए। मतलब, वह मुझे मौका दे रहे हैं। फिर यह जो मौसम है, इसमें ठंड अभी शुरू हो रही है। सबके पास एक-दूसरे के खूब खूब न्योते हैं। कहीं गौना है। कोई बारात जा रहा है। कहीं बहु भोज है। कोई भंडारा करवा रहा है। चूंकि हम यहां नहीं रहते इसलिए इन सभी निमंत्रणों से हम अनुपस्थित हैं। यह कोई असामान्य बात नहीं है। ऐसा ही होता है। लेकिन जिस बात को कहने के लिए यह भूमिका बना रहा हूं, उसमे सिर्फ़ इतनी बात है, कि यहां भी पांच बजने का इंतजार कर रहा हूं। यहां पानी नहीं भरना फ़िर भी यह इंतज़ार मेरे साथ यहां चला आया है। दो दिन सच में दिमाग एकदम तैयार हो गया। कुछ होगा। कुछ नहीं हुआ।

यहां दिन ढलने का मतबल है, सब लोगों का अपने-अपने घरों में वापस लौट जाना। यह अक्सर और हमेशा का मामला नहीं है। लौटते हमेशा पुरुष हैं। इंतज़ार महिलाएं बूढ़े करते हैं। बच्चे नहीं करते होंगे, ऐसा नहीं है। इन बीतते दिनों में मैं यहां से कई सारी बोलती तस्वीरें अपने साथ ले जाने की गरज से भर गया हूं। अपने फेसबुक प्रोफ़ाइल पर वीडियो बना रहा हूं। इंस्टाग्राम पर कई सारी तस्वीरें लगा चुका हूं। यह जीवन किसी ने देखा नहीं होगा, ऐसा भाव मेरे अंदर नहीं है। इसे, जैसा है, उसमें से थोड़ा हिस्सा समा लेने की कोई बात होगी। कैसे वह इन जगहों को भर रहे हैं। यह रिक्तता को भरने जैसा भी नहीं है। बस जिस तरह जीते आ रहे हैं, मेरे सामने भी वैसे ही जी रहे हैं। जी न भी रहे हों पर अभिनय वैसा ही कर रहे हैं।

बस इधर हुआ यह है कि छत पर जाकर बैठ जाता हूं। दिल्ली से चार किताबें मेरे साथ यहां आई हैं। दो पढ़ चुका हूं। समर शेष है। अब्दुल बिस्मिल्लाह। सन् नवासी। 'वह' जिसका कोई नाम वहाँ नहीं है। वह कोई नहीं है। दूसरी 'ओस की बूंद'। राही मासूम रज़ा। सन् सत्तर। दोनों को आगे-पीछे इसी क्रम से पढ़ गया। दोनों किताबें अलग-अलग वक़्त में लिखी गई हैं। तुलना जैसी कोई बात नहीं है। इसके बावजूद दोनों के मुख्य चरित्र उसी तरह बुने हुए लगते हैं। दोनों आत्मकथात्मक शैली में कहे गए हैं। दूसरे को इतना ना भी माने, तब कई चरित्र कथा में थोड़ी देर अपनी बात कहते हैं। इस पर कभी फु़रसत से लिखूंगा। और अगर मेरा बस चले तब, 'ओस की बूंद' किसी को पढ़ने के लिए नहीं दूँगा। कारण अभी पता नहीं। शायद वह हममें से कई लोगों की मंशा को ज़्यादा बेपर्दा कर पाता है इसलिए। उसने बताया, औरत की देह सिर्फ़ देह है। सब उसे भोगना चाहते हैं। हो सकता है, वहाँ लिखी बातों से यह बात एकदम उलट हो। पर मेरे पास यह ऐसे ही मन में बैठ गयी है। शायद मेरे मन में यह भाव हावी हो गया हो।

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