आगरा बेकार

इस बीतती रात जब पापा के खर्राटों के बीच जल रही एक ट्यूबलाइट में कुछ ऐसे ही ख़यालों में डूब रहा हूँ, तब मुझे न जाने कैसे उस शहर के वह दोनों लोग दिख गए। वह हमारे सामने अपने शहर को कतई खुलने नहीं देना चाहते। हम भूख से एकदम छटपटा रहे थे, जब हमने उस ऑटो वाले से एक ठीक-ठाक खाने की जगह पूछी। वह पता नहीं क्या सोच कर एक जगह ले आया। खाना एकदम बेस्वाद था। दाल में ही थोड़ी सी वह जगह बची रह गयी थी, जिसमें हमें डूब मरना था। पर बच गए। वह कमीशन के मारे हमें वहाँ ले आया होगा। वरना खीरा बेचने वाली अम्मा ने बिजलीघर चले जाने को कहा था। कहा था, वहाँ बढ़िया खाना मिल जाएगा। मैं इस शहर को उस तांगेवान से भी नहीं जोड़ना चाहता। जब हफ्ता भर पहले वहाँ से लौटा, तब सोचता था, इनके लिए अपशब्दों से अपनी बात शुरू करूंगा। पर ठहर कर लगता है, वह उस शहर में जिंदा रहने की जद्दोजहद में इस युक्ति को अपना रहे हैं। वह ख़ुद को इन दुकानों पर बेच रहे हैं ।

उनके लिए एक ही रटी-रटाई लाइन है। यहाँ पंछी पेठे की बारह दुकाने हैं। हम बताएँगे बाबू जी, कौन सी असली वाली है। दूसरी में वह चमड़े का सामान बेच रहे होते हैं। पीछे कारख़ाना है, आगे दुकान है। अंदर जाने पर वहाँ से पहले से मौजूद लड़का बोलता है, आपके पास वक़्त नहीं है, वरना पूरा मुआयना करवाते आपको। उस चमड़े वाली दुकान से निकलते हुए उसके मालिक ने हमें चलते हुए देख कर पीछे से कहा, ऐसे ही चले जाओगे आगरे से कि कुछ जेब भी खाली करोगे? चलो कोई नयी। पेठा ही लेते जाओ हमारी दुकान से। तब हमें पता चला। हम अपनी जेब खाली करने आए हैं। बगल में उसकी दूसरी दुकान थी। उसने बताया, पूरे शहर में पंछी पेठे की साढ़े तीन सौ दुकाने हैं। पर असली सिर्फ़ बारह हैं। एक छपे हुए बोर्ड की तरफ़ इशारा करते हुए उसने कहा, हमारी उनमें से एक है। हमारा एक दिन का शहर इन दो दुकानों में सिमट कर रह गया।

हम जिस ठेठ शहर को अपनी इस दिल्ली की नज़र से एक बहुत पुराने शहर में दाखिल होने की ख़्वाहिश लेकर उसमें दाख़िल होने आए थे। यही तो नज़ीर का शहर था। यहीं कभी उन्होंने 'आदमीनामा' को गुनगुनाया होगा। कोई नज़्म लिखी होगी। रोते गाते, अंदर ही अंदर हमारे लिए इस शहर को सिमटता हुए देखने के बावजूद हम उनकी कब्र पर नहीं जा सके। हम बालूगंज से चलते हुए शहज़ादी की मंडी से सदर तक पहुँचे। सोचने लगा घनानन्द कभी अपनी सुजान को ढूँढते हुए यहाँ आए होंगे? लगा, नहीं आए होंगे। आए भी होंगे, तब यह शहर इस तरह नहीं होगा।

हबीब तनवीर का 'आगरा बाज़ार' हमारी नज़रों से ओझल ही रह गया। मैं बस यही सोचता रहा, काश हम जो सोच रहे थे। अपने आप इस शहर की सीमाओं को बुनने की इच्छाओं से भर गए थे। वह पूरी हो जाती, तब कितना अच्छा होता। हम यह जानकार क्या करते कि पंछी पेठे की असली दुकान सदर में हैं और पूरे आगरे में सिर्फ़ उनकी तीन दुकाने हैं। जब हम खीज गए। झुंझलाहट में अपने लाये वक़्त को ख़र्च करने की मियाद पर पहुँच गए, तब आठ किलो पेठा खरीद लिया। इसी में हमने वहाँ बिताए पलों को घोल लिया होगा। कोई पूछेगा, तब हमारे पास उन घड़ियों में मिट गए समय की पहचान, ख़बहे के बने पेठे के अलावे कुछ नहीं होगी। वह शहर इन पेठे से कुछ ज़्यादा रहा होगा। पर सिमट कर उन डिब्बों में बंद हो गया।

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