अनुपस्थित

मैंने कई जगहों से ख़ुद को अनुपस्थित कर लिया है. मेरे जैसे कई लोग और भी होंगे, जो कभी-न-कभी ऐसा किया करते होंगे. यह गायब कर लेना, किसी भी तरह से पलायन नहीं माना जाना चाहिए. यह गायब हो जाना इस समय की सबसे बड़ी चालाकी है. वह सूरज भी तो हर शाम ढलने का बहाना बनाकर अनुपस्थित हो जाता है.  कोई उससे तो नहीं पूछता. वह कहाँ चला जाता है.उसके जाने पर ही हम रात होते-होते चाँद को देख पाते हैं. तारें भी आसमान में बिखर जाते हैं. एक का जाना हमें असहज करता है पर प्रकृति में वह एक क्रम है. एक ऐसी व्यवस्था, जहाँ सब एक के बाद एक होने के लिए अपनी तय्यारियों में लगे रहते हैं. सोचता हूँ, तब बहुत सी जगहों पर अब लौटने का मन नहीं करता. एक मन यह भी होता है. इस जगह पर भी आना अब बंद कर देना चाहिए. कोई भी तो नहीं है, जिसके लिए आया जाए. मन एकदम जहर हो गया है इधर. किसी को भी नहीं छोड़ रहा. एक एक कर सबसे बदला लेने के ख़याल से भर जाने के बाद ऐसा होना सहज ही माना जाएगा. किसी ने मेरा कुछ बिगाड़ा नहीं है. कौन किसी का कुछ बिगाड़ पाया है. पर फिर भी मन, उसे ऐसे ही होना है. बेसिर पैर के ख्यालों में डुबोते रहना. तैर मैं कभी नहीं पाया हूँ. हर बार तल को छूकर लौटता हूँ.

मेरे पास लिखने को कुछ बचा नहीं है यह बहाना बहुत पुराना हो चुका है. इसे कोई नहीं मानेगा. यह तो बहुत छोटी जगह है. सूई के नोक के बराबर. या उससे भी छोटी. नंगी आँखों से न दिखने वाली जगह. ऐसे ही गाय भी एक बहुत बड़े देश से गायब हो जाना चाहती होगी. उसे कोई होने नहीं दे रहा है. वह परेशान होगी, मेरी तरह. वह भी कुछ कर नहीं पा रही होगी. जेब से पैसे की तरह गायब हो सकता तो कब का गायब हो जाता. नहीं मन करता तो किसी वर्ष का वित्तीय घाटा बन जाता. फिर कोई नहीं पूछता. जैसे इस पूरे परिदृश्य से अनुपस्थित नौकरी को कोई नहीं पूछ रहा है. मुझे भी कोई नहीं पूछ पाता. पूछने के लिए होना ज़रूरी है, और मैं इस मूलभूत ज़रूरत को ही अनुपस्थित कर देना चाहता हूँ. क्या मैं ऐसा कर पाऊंगा?

यह मेरे लिए इधर सबसे बड़ा सवाल है. मन किसी काम को करने का नहीं करता. यह भी तो एक काम है. इस अंतर्विरोधी बात के बावजूद खुद को गायब कर लेने की इच्छा अन्दर घर कर गयी है. इतने सारे सवालों, उलझनों, उलटी सीधी बातों को जो नहीं लिख रहा हूँ, उसका एक कारण मेरे सामने दिवार पर चिपकी छोटी सी छिपकली है. वह दीमक को कल से अपने घर से निकाल निकाल कर खा रही है. पता नहीं सच में खा रही है या नहीं पर दीमक डरी हुई हैं. वह अब अपना घर दिवार पर और नहीं बढ़ा सकी हैं. जहाँ कल रात थी, वहीं अभी भी इतने घंटों बाद भी चिपकी हुई हैं. अगर आपको यह बात, ऊपर लिखी किसी बात से जुड़ती हुई नहीं लग रही है, तब आपको प्रश्न प्रधानमन्त्री से पूछने चाहिए, ऐसा क्यों है? वह ही इसमें कार्य-कारण सम्बन्ध न होने के एक मात्र उत्तरदायी हैं. हमने बस उनसे यह गुर सीख लिया है. बात बनाओ. चाहे उसमें कोई तार्किक परिणिति हो या न हो, इसे सामने वाले पर छोड़ दो. वह अपने दिमाग से समझ लेगा. इस दौर में अगर में कई अनकही जगहों से गायब हो जाना चाहता हूँ, तो क्या मैं गलत इच्छा से भर गया हूँ? मुझे तो नहीं लगता. उलटे यही तो सबसे माकूल वक़्त है, गायब हो जाने का. समझे कुछ? यह फिर समझाऊँ..??

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