रुक्का

दिल्ली की गर्मी में यह कुछ ऐसे दिन हैं, जब अखबार अगले तीन दिन भारी बारिश की ख़बरें छापते हैं. गमले अखबार नहीं पढ़ते. पानी न डालो तो सूख जाते हैं. प्यार भी पानी की तरह होता होगा. जब कोई साथ नहीं रहता, सिर्फ यादों में रहता है, तब जाकर एक ऐसा बिंदु आता होगा, जब उसकी यादें भाप बनकर हमारी त्वचा से बाहर निकलता हुआ हमें साफ़ दिख जाता है. यह एक दुखद पहलु है. पर यह वही यादें हुआ करती होंगी, जिनमें यादें नहीं होंगी. बादलों की अनुपस्थिति आसमान को भी इसी तरह रचती है. वह भी इंतेज़ार में नीला पड़ जाता होगा. मुझे पता है, मेरी बातें बीच में टूट रही हैं. पर क्या करूँ? टूटते हुए ऐसे ही लिखा जा सकता है. कभी वैसी ज़मीन देखी है, जो कढ़ाई की तरह गोलाई लेते हुए हो और ठीक सा गड्ढा भी न हो. उसमें जब बरसात का मटमैला पानी भरकर धूप में सूखने लगता है, तब दिखाई देती है, उसके नीचे की वह मुलायम मिटटी जो पपड़ी बनकर टूटने को होती है. वैसा हो गया हूँ. बिलकुल वैसा.उसके बीच में उभर आई दरारें उस इंतज़ार को गिनने के लिए काफ़ी हैं. मेरा लिखा हुआ भी उन दरारों सा है. जो अनलिखा है, उन्हें भी जोड़ लिया करुंगा. तब शायद यह इंतज़ार कुछ कम हो पाए.

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

आबू रोड, 2007

शहतूत आ गए हैं: मेरी पहली किताब

हिंदी छापेखाने की दुनिया

जगह

हंस में आना

वापसी

आठवीं सालगिरह