पीछे जाते धागे

यह बड़े दिनों से मेरे अन्दर उमड़ती-घुमड़ती हुई कई सारी बातों के सिरों को पकड़ने की कोशिश है. इसे मैं अपने में वापस लौटने की प्रक्रिया के रूप में देखना चाहता हूँ, पर पता नहीं कितना इसके लिख लेने के बाद कह पाऊंगा? बात सिर्फ एक तरह के लिखने की नहीं है. यह उससे कुछ ज्यादा की मांग करने जैसा है. जैसे मैं करनी चापरकरन लिख रहा था और उन दिनों की अपनी बनावट बुनावट की तरफ देखता हूँ, तब लगता है, उस दौर में जो छटपटाहट अपने अन्दर महसूस करता था, उसे खुद ही ख़त्म कर दिया. यह उन लिखी हुई बातों से कहीं न पहुँच पाने की खीज रही होगी. इन दिनों का दुःख उन पंक्तियों में झलकता हुआ, मेरे बगल दिख जाता होगा. वह अन्दर की बेचैनी पता नहीं किस कदर मुझे गढ़ रही थी. मैं डायरी पर. पैन से. यहाँ टाइप करता हुआ. मन के अन्दर अनगिनत अन लिखे पन्नों को समेटे हुए चल रहा था. जितना सर से उतारता उतना ही उसका वजन बढ़ जाता. लगता, अभी इस जेब से कुछ सामान बाहर रखा है, तो पीछे वाली जेब में कोई पौधा उग आया है. जहाँ आपको लग रहा था, जेब की सीवन फट गयी थी, वहीं कई सारी जड़ें इकठ्ठा हो गयी हैं. जो कहीं जाती नहीं हैं. वह सब अनायास आप तक आ गयी हैं.

जब आप लिखते हुए कहीं नहीं पहुँचते और यह आपको लिखी हुई अपनी पहली पंक्ति से पता होता है, हम लिख कर कहीं नहीं पहुंचेंगे, तब भी कहीं पहुँच जाने की जद्दोजहद में हम किन्हीं आकांक्षाओं से घिर जाते हैं. यह खुद से लिखने की बात खुद को हजम नहीं होती. मैं कोई खराब नहीं लिख रहा था. वह बस मेरे मनमर्ज़ी के दिनों का अभाव था. जैसा सोचता, वैसा कुछ भी न होता देख, वहां से भाग जाने की जिद में कुछ कह देने का बहाना हुआ करता. वह परिस्थितियाँ जिस तरह हमें बन रही थीं, वह आज भी जस की तस हैं. उनमें रत्ती भर भी कुछ टस से मस नहीं हुआ है. सतह पर उम्र के साथ कुछ सूचनानुमा चीजों में इजाफ़ा ही हुआ है. नौकरी तब भी नहीं थी. आज भी नहीं है. तब पढ़ नहीं रहा था, आज पीएचडी के नाम पर कहीं पढ़ रहा हूँ. शादी हो गयी है. कभी-कभी तो लगता है, इसी पर खंडकाव्य से लेकर महाकाव्य लिखे जा सकते हैं. बेरोज़गार होना इसमें अवसाद को मवाद की तरह रोज गाढ़ा करता जाता है. अभी वह दर्द इकठ्ठा हो रहा है, ऐसा नहीं है. वह पीड़ा रह रहकर अपना काम कर जाती है. उदासीनता इसी के मध्य उपजी व्याधि है. आप लिखने से बचने लगते हैं. क्या करेंगे लिखकर?

फिर लिखेंगे तो तभी, जब मन पता नहीं किन-किन ख्यालों से खाली होकर थोड़ी देर का इत्मीनान भर दे. नहीं हुआ मुझसे. मैं भाग गया था जैसे. अपने ब्लॉग को बंद कर देने का निर्णय एक दिन में नहीं लिया. मैं सोचता, यह ऐसी टकसाल है, जो मेरे बेकार के दिनों की अलमारी बन चुकी है. एक-एक ताखे में पुराने दिनों की तस्वीरें हैं. यहाँ से चले जाने के बाद शायद कुछ बदल जाएगा. मैं उसके एक ढांचे से भी परेशान हो गया, जिसमें जो कुछ भी लिखने की कोशिश करता, उस पर मेरा अख्तियार नहीं रहता. वह अपने आप उसे किसी शक्ल में ढाल दिया करता. यह मेरे लिए कभी भी सही जगह बनकर नहीं दे रहा था. यह मुझे उसी तरफ मोड़ दिया करता, जहाँ से भाग लेने के लिए मैं पता नहीं क्या-क्या करने लगा था.

वह बेचैनी जिसमें हर भोगा गया अनुभव लिख लिए जाने के लिए था, उसके लिए उतना सचेत भी रहता. बाकायदा कागज़ पर नोट लेता. कहीं रुक्कों पर कोई याद लिख लिया करता. किन्हीं संकेतों में पेन्सिल से कुछ लिखकर छोड़ देता. बाकायदा कोई ब्लॉग डायरी ना बनाकर भी कुछ था, जो अपने को समेटे हुए रहता. यह शब्दों के चयन से लेकर उसकी प्रस्तुति तक सबमें दिखता. लिखना मेरे लिए सुविधा कभी नहीं रहा. यह किसी तरह का चुनाव भले लगता रहे, पर यह ऐसा भी नहीं है. लिखना बस लिखना था. अपने हिस्सों के कहे जाने और अपने दावे को मजबूत करने की दावेदारी की तरह. हम उन्हें बता देना चाहते थे कि तुम्हारे लिखे हुए इतिहास में हम कहीं दर्ज भले नहीं हो पायेंगे, पर जो हमें जान जाएगा, वह कभी नज़रंदाज़ नहीं कर पायेगा. यह आत्मस्वीकृति वहां कई बार अलग-अलग शब्दों में आती रही और एक दिन ऐसा भी आया होगा, जब किसी की परवाह करना भी छोड़ दिया. सच में यह परवाह करना छोड़ देना ही था. मैं खुद को बचा लेने की बहुउद्देशीय योजनाओं पर अनकहे काम करने लगा. मुझे लगता, यहाँ रह गया, तब मुझे टूटने से कोई नहीं बचा सकता.

उस मिजाज़ की टूटन से अब कहीं और जाने का मन बनाने में साल भर लग गया. एक बार तो बंद करके दोबारा वापस आया. पर लगा, कुछ ख़ास बदला नहीं. वह जगह मेरे लिए और हिंसक होती गयी. मुझे बनाने वाले धागों में उलझकर गिर जाने से अच्छा था, वहां से चले आना. यह वहां से आने की मेरी व्याख्या है. हो सकता है, दस साल बाद या कई और दस सालों बाद, कोई मेरे लिखे को पढ़कर किसी और सैद्धांतिक रुपरेखा को प्रस्तुत करे. पर आज, अभी मुझे यही लगता है. मेरा वहाँ से लौट आना उन जगहों से खुद को साबुत बचा लेने की आखिरी कोशिश थी. पढ़ने वाले उसका अंदाजा लगा सकते हैं, पर कभी-कभी उन शब्दों की सीमाओं में हम उस मर्मान्तक पीड़ा तक पहुँच भी रहे हैं, इसका दावा उनके अन्दर कहीं मौजूद नहीं होगा. मैंने हमेशा शब्दों को ऐसी जगह बहुत असहाय पाया है. उन्हें कहने के उपक्रम में उन्हें बिलकुल उलटी दिशा में भेजकर पूरे विवरण बदल दिए हैं. वह इन्हें किन धागों से पहचान पायेंगे कह नहीं सकता.

मेरा एक दोस्त कहता है, तुम्हें इन सारी बातों से, जो तुमने कहीं हैं या नहीं कही हैं, उनसे बचना नहीं चाहिए. यही बातें हैं, जो तुम्हें तुम बनती हैं. हर व्यक्ति अपनी परिस्थितियों के बीच में बनता बिगड़ता है. तुम्हें लगता है, तुम इनसे बचकर किसी अलग तरह का लिख पाओगे, ऐसा भी नहीं है. हम अपने परिवेश, अपनी मनः स्थिति से कैसे भागेंगे? मैं भले नहीं लिखता, पर तुम्हारे लिखे हुए को शायद मैं भी एक तरह से जानता हूँ. यह फैसला तुम्हारे पाठक भी करेंगे, तुम किस तरह बन रहे हो? तुम्हारी शैली में ऐसे सूत्र होंगे जो पहचान जायेंगे, यह तुमने लिखा है. उन्हें बताने की ज़रूरत नहीं है. वह अज्ञेय को इसी तरह पहचानता आया है, इसलिए मेरे लिए भी यही बात कहता है. हम सिर्फ एक काम कर सकते हैं, हम लिख सकते हैं. लिखने के बाद उसकी ध्वनियाँ, बिम्ब, प्रतीक किस तरह दूसरी तरफ जायेंगे, इया पर हम नियंत्रण भी कैसे रख सकते हैं?

मुझे नहीं पता, करनी चापरकरन को बंद करके मैंने कैसा किया? बस इतना पता है, यहाँ इस जगह मैं उसकी छाया भी नहीं पड़ने देना चाहता था. पिछली दो-तीन पोस्टों में उसकी आहट को महसूस किया तो एकदम ठिठक गया. मैं खुद को फिर उन्हीं धागों में उलझाने की गरज से यहाँ नहीं आया. खूब सोचता रहा. शायद अभी भी सोच ही रहा हूँ. यह तय नहीं कर पा रहा हूँ कि इस जगह का मुझे क्या करना है? दिमाग कई दिनों से एकदम बंद होकर मेज़ के पास किताबों की तरह धूल खा रहा है. सोच रहा हूँ, जो अन्दर चल रहा है, उसे एक बार कह देना चाहिए. फिर देखेंगे, क्या होता है?

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