उदास आँखों वाली

उसकी आँखें मुझे कहीं दरिया गंज के इतवार बाज़ार में सड़क पर पड़ी नहीं मिली थीं. न उन्हें लाल किले के पीछे लगने वाले चोर बाज़ार से खरीद कर लाया था. वह बाहर से मेरे अन्दर देखती हुई हर बार मिल जाती. वह वहीं थीं. माथे के पास भौहों के बिलकुल नीचे. उन्हें हर बार वहीं होना था. यह आँखों वाली लड़की हमेशा कहीं रोक लेती. रोक कर मेरी आँखों के बारे में पूछा करती. 

वह जब भी उदास दिखती, मैं सबसे पहले उसकी आँखें देखा करता. वह कहीं नहीं देख रही होतीं. उनमें सिर्फ़ मैं होता. यह होना मैंने चाहा नहीं था. फिर भी होता. क्या करता. बस चुप सा उसे देखता रहता. उनकी आँखों से आँसू भाप बनने से पहले आहिस्ते आहिस्ते गालों के पास बहते हुए आते. उनका होना  किसी पिघलती बर्फ की नदी की तरह शांत नहीं होता. वह बस उस दुःख के ताप से बहती रहती. उन बूंदों में ओस की ठंडक कभी नहीं थी. उनमें किसी की नाकामियों का दर्द दर्ज़ था. वह कुछ कहती नहीं. बस सब बता देती, उसकी आदत नहीं थी. किसी की चुगली करने की. फिर भी सब उसकी चुगली करती आँखें बता देती. 

इन सारी पंक्तियों के बाद इस आख़िरी पंक्ति में बस इतना कहना है, ऊपर लिखा सब झूठ है. और कुछ नहीं.

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