देखते हुए

हम किन चीजों से घिरे हुए हैं, यह देखते रहना चाहिए. इससे एक तो इससे हम ख़ुद को स्थित कर पायेंगे और दूसरी बात हमें पता होगा, कौन से ख्यालों से हमें लड़ना है. यह संघर्ष की स्थिति दिखाई नहीं देती लेकिन होती आँखों के सामने ही है. यह दौर देखने का है. हम अपनी आसपास की दुनिया को इससे बाहर समझने के लिए राजी नहीं हैं. जितना हमें दिखाया जा रहा है, उतना ही सच हमारे लिए काफ़ी है. अगर यकीन नहीं आता तो अपनी भाषा में देखने को लेकर जितनी भी लोकोक्तियाँ और मुहावरे हैं, सबकी एक सूची बनाकर देखिये.

हम टीवी देख रहे हैं, हमारे सामने एक खिड़की खुलती है और हम एक घर के भीतर ख़ुद को पाते हैं. वह हमें नहीं देख रहे. हम ऐसी जगह हैं, जहाँ वह हमें कभी देख ही नहीं पायेंगे. यह घर किसी धारावाहिक का सेट होगा, जिसपर अभिनेता अभिनेत्रियाँ अभिनय से एक दृश्य रच रहे होंगे. ज़रा पिछली रात देखे गए किसी एक धारावाहिक की कोई एक मामूली सी घटना को उठाकर देख लीजिये, क्या वह हमारे आपके सामान्य घरों का प्रतिनिधित्व करते हैं? उनकी वह कठिनाई या समस्या हमारे जीवन के निजी अनुभवों से मिलान नहीं कर पाती है. फिर हम क्यों उन्हें देख रहे हैं ? यह मनोरंजन की सी पारिभाषिक शब्दावली में समाएगा, कहा नहीं जा सकता.

इनके बीच में आने वाले विज्ञापन, जिसमें अपनी त्वचा के रंग के प्रति घृणा जैसे भाव भर देने की ताकत है, इसका अंदाज़ा हम लगा नहीं पाते. यह नस्लभेद की पूर्वपीठिका है. कैसे काले से गोर होने की इच्छा उन सारे श्याम वर्णी लोगों के अस्तित्व को सिरे से नकार देना है. यह इच्छा स्त्रियों से लेकर पुरुषों में सामान रूप से व्याप्त है. मेरी पत्नी वही होगी, जो आटे की तरह सफ़ेद होगी. इसी को वह विज्ञापन 'फ़ेयर' कहते आये हैं. लड़की भी ख़ुद को पसंद होते हुए देखना चाहती है. यह आइरिस यंग की किताब का कोई अध्याय नहीं है, जहाँ स्त्रियाँ ख़ुद को आईने में देख रही हैं. बारीक नज़र में वह भी हमें एक उत्पाद बनाती एक छद्म विमर्श रचती स्त्री ही लगने लगती हैं.

हम देख नहीं पा रहे हैं, कैसे समाचार चैनलों ने इस देश की एक दूसरी राजधानी खोज ली है. उनकी सुबहें उस प्रदेश के मंत्रियों के साथ शुरू होती हैं, जहाँ वह टीवी कैमरा के साथ औचक निरिक्षण पर निकलने वाले हैं. मुख्यमंत्री के पहुँचने से पहले तालाबों को पानी के टैंकरों से भर देते हैं. कैमरों के सामने भैंस वहाँ नहा रही है. जॉन बर्जर इसे किस तरह का देखना कहते इसके लिए अभी अवकाश नहीं है या कहा जाए यह देखना ही नहीं है.

इसी देश की राजधानी में एक जंतर मंतर है. वहाँ तमिलनाडु से आए किसान धरने पर बैठे हैं. एक दिन अप्रैल की तपती धूप में वह सब निर्वस्त्र होकर संसद के सामने अपना विरोध प्रदर्शन करते हैं. कल उन्होंने कहा, अगर सरकार उनकी माँगे नहीं मानती है, तब आज वह अपना मूत्र पियेंगे और कल अपना मल खायेंगे. यह इस दौर की सबसे हिंसक पंक्तियाँ हैं. लेकिन हम इस दृश्य को अपने सामने घटित होता नहीं देख रहे हैं. इसलिए दुनिया के इस उष्ण कटिबन्धीय भौगोलिक क्षेत्र में यह घटना कभी हुई ही नहीं. यह किसान नहीं हैं. यह कभी अपने प्रदेश से यहाँ आये ही नहीं हैं.

यह हमें तय करना होगा, हमारे अधकचरे दिमाग में कौन सी छवियों को लगातार पोषित किया जा रहा है? हम किस तरह अपने चिंतन संसार को रच रहे हैं? हमारे सोचने के फलक पर किन घटनाओं के दृश्य कभी नहीं उभरते? हमारे दृश्यों में किसी फ़िल्म का ट्रेलर है. किसी अभिनेत्री के स्तनों का उभार है. कोई अधनंगा अभिनेता किसी क्रीम को बेच रहा है. किसी निजी सेवा प्रदाता के ख़त्म हो रहे प्लान की सूचना है. किसी व्यक्ति के राष्ट्र स्तर के नेता बनने की आकांक्षा स्वरुप उसके द्वारा योजना उदघाटन के कार्यक्रम के सीधे प्रसारण हैं.

लेकिन एक पल ठहरिये. सोचिये क्या अनुपस्थित है? वह क्या है, जो इन इकहरे वक्तव्यों में नहीं है? वह किस तरह के दिमागों के व्यवस्थापक बनने की इच्छा से भर गए हैं? अगर हम आज कोई अंतर नहीं कर पा रहे हैं, तब हमारी क्षमताएं कितनी कुंद हो चुकी हैं? किन दृश्यों, घटनाओं, सूचनाओं, चर्चाओं को बनने से पहले उन सारी संभावनाओं को ख़त्म किया जा रहा है. हमारे पास इसका विकल्प क्या है? अगर आज यह सवाल नहीं बना, तब कल हमारे पास यह सवाल ही नहीं रहेगा. हमें ख़ुद से पूछना होगा, क्या हम इन दृश्यों के समानांतर अपने दृश्यों को खड़ा कर सकते हैं?

{यह हिस्सा आज जनसत्ता में 'दुनिया मेरे आगे' स्तम्भ में आया है. वहाँ शीर्षक है, 'समान्तर दृश्य'. वर्ड में पढ़ने के लिए यहाँ और पीडीऍफ़ में पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें.}

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