मिलान करना

यह बात डायरी में क्यों नहीं लिख रहा हूँ, मुझे नहीं पता. वह मेरा कोई ख़ास दोस्त नहीं है. बस दोस्त है. जिसे कभी हमराज़ बनाने की सोचा भी नहीं. वक़्त के उन लम्हों में हम शायद उन्हें अपनी सारी बातें नहीं बता पाते जो हमें बहुत पहले से जानते हों. यह लड़के और लड़की दोनों पर सामान रूप से लागू होता है. उनके इन दोनों में से कुछ भी होने से फ़र्क नहीं पड़ता. फ़र्क पड़ता है, उनके हमारे इतने पास होने से. यहाँ यह निकटता बचपन से साथ रहने के कारण आई लगती है. हम सब एक कम्फर्ट ज़ोन चाहते हैं. हम जिससे कहें, वह उन सूचना का चाहकर भी कुछ नहीं कर पाए. अगर वह कुछ करना भी चाहे, तो वह उसे हमारे अहित में इस्तेमाल नहीं कर पाएगा. 

वैसे आज जो बात कहने जा रहा हूँ उसमें इन ऊपर कही गयी किसी बात से सीधा ताल्लुक नहीं है. मुझे तो यहाँ तक लगता है, मुझे यह सब बातें कहनी भी चाहिए थी या नहीं. खैर, अब कह दिया हैं तो ज़्यादा सोचूँगा नहीं. कभी ऐसा भी होना चाहिए. ख़ुद न पता चले किस सिरे से शुरू हुए थे और अगला सिरा कहाँ जाएगा. खैर. कोई बात नहीं.

उसकी शादी लगभग तय है. जिससे होने जा रही है, वह उससे मिलने गया. वहाँ से उसने तस्वीर लगायी. तस्वीर में दोनों साथ खड़े हैं. इसे शायद साथ खड़े होने से कुछ ज़्यादा ही कहेंगे. पर कह नहीं रहा हूँ. वह अपने बड़े जन की तरह नहीं है. फ़िर भी घर वालों ने ही लड़की देखी होगी. वह सिर्फ़ अपने मानकों पर उन्हें पसंद नापसंद करने वाली भूमिका में होगा. इस प्रक्रिया से गुज़रकर जिसे उसने चुना है, वह उसकी अपने साथ तस्वीर साझा करता है. अब मेरे अन्दर तब से अजीब से ख़याल आ रहे हैं. उन दोनों को लेकर नहीं. इनका उनसे कुछ भी लेना देना नहीं है. 

मैं बस उस लड़के से अपना मिलान कर रहा हूँ. जब हमारी शादी हुई थी, तब भी नौकरी नहीं थी. अब भी नहीं है. इच्छा को शायद नौकरी के बाद ही इच्छा कहा जा सकता है. उससे पहले वह सिर्फ़ सपने हैं. यह बात कितनी ही बार दोहरा चुका हूँ. अभी फ़िर कह रहा हूँ. उस लड़के के पास नौकरी है. उसके सपने जब वह चाहेगा, सच हो जायेंगे. मैं बस उससे इस बात में पिछड़ जाता हूँ. ऐसा सोचना ही मुझे ख़ुद से हरा देता है. क्या करूँ? पता नहीं.

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