इच्छा

इच्छा हमारे अन्दर पानी की तरह रिसती हैं. जैसे हम कोई मिट्टी का ढेला हों और हम पर नन्हा सा बादल आकर बरस पड़े. हम हमेशा इन्ही से भरे रहना चाहते हैं. कुछ केंचुए सपने की तरह इन इच्छाओं की मिट्टी में उमड़ते-घुमड़ते इन्हें और उपजाऊ करने की गरज से चले आते होंगे. अगर गणित की तरह हम इच्छा को सपनों की तरह अवास्तविक मान रहे हैं, तब हमारा सारा गणित धरा का धरा रह जाता है. हम जो बिन नौकरी वाले लड़के होते होंगे, अन्दर-ही-अन्दर ख़ूब कुढ़ते होंगे. कह तो पाते नहीं होंगे, क्या सब अन्दर चल रहा है. फर्क भी किसे पड़ता है? कोई सुनने वाला नहीं होता. इस पर अगर शादी हो जाये तब तो सोने पर सुहागा की तरह कोई वक्रोक्ति खोजनी होगी. कोई ऐसी बात जो इसका बिलकुल उल्टा अर्थ देती हो. कोढ़ में खाज कहना थोड़ा अमानवीय है. अमानवीय तो ऐसे लड़कों का कुछ सोचना भी है. सोचना इस बात का सूचक है, दिमाग चल रहा है. जबकि उसे काम करना बंद कर देना चाहिए. वह काम करके भी क्या करेगा. उसके मुताबिक होना तो कुछ है नहीं.

कभी-कभी तो लगता है, ऐसे लड़कों को सपने देखने के ख़ुद को रोक लेना चाहिए. यह अकल्पनीय है. पर हम कोशिश किये बिना ऐसा कैसे कह सकते हैं, यह नहीं हो सकता. कोशिश सेंध लगाने से शुरू होगी. मैं भी यह लिखकर अपने में सेंध लगाना शुरू कर रहा हूँ. कोई भी ऐसी बात अभी तक नहीं हुई है, जिसे मैंने सपने में देखा हो और वह हुबहू सामने घटित हो गयी हो. जो सपने में देखता हूँ वह सपने में ही रह जाता है और जो सामने होता है, उसे सपने में भी सोच नहीं पाता. सब कहते हैं, वक़्त लगता है. यह जो इच्छाएँ हमारी साँसों की तरह हमारी ज़िन्दगी की मूलभूत ज़रूरत की तरह हैं, बिलकुल ततइया की तरह होती हैं. वह एकबार काट ले, तो बस, पता चल जाए, यह क्या बला है. कभी तो ऐसा भी लगता है, इनका भी कहीं कोई बाज़ार होता होगा. सब उसी में नपता, खपता रहता है. इसी ख़याल के गुज़रते हुए एक दूसरा ख़याल अन्दर दाख़िल होने लगता है. मेरी इच्छा तो बस तुम्हारे पास रहने की है. बाक़ीयों के पूरा होने का इंतज़ार हम कर सकते हैं. जैसे ही अपने में तुम्हें जोड़ता हूँ, कई इच्छाएँ अपने आप तरल होकर पिघलने लगती हैं. तरल हो जाना उनका हमें चारों तरफ़ से घेर लेना है. वह ऐसी भी तरल बनी रहें. ठोस होंगी तो बर्फ़ होगी.

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