कैमरा

कभी-कभी हम स्मृतियों के हिस्सों को हमेशा अपने साथ रखना चाहते हैं. यह एक क़िस्म का लालच है. तृष्णा है. जो कभी पूरी भी हो सकती है, इस पर कुछ नहीं कहा जा सकता. हम सब इन्हीं क़िस्म की छोटी-छोटी इच्छाओं से भरे हुए होते हैं. मैं भी इन इन्हीं न दिखने वाली इच्छाओं से भरा हुआ हूँ. यह शादी के साल की बात है. उससे एक महीने पहले. मार्च ही चल रहा होगा. दिन भी ऐसे होंगे. तब सर्दियाँ अप्रैल तक गाँव की छत पर थीं. उनमें सीत भी थी और अजीब क़िस्म की हरारत भी. आम तौर पर ऐसा होता नहीं है. पर उस बरस ऐसा ही था. पुराना कैमरा सही नहीं था. नया लेना था.

सोचता रहा, कब लूँगा. दिल्ली से उसी इतवार निकलना था. मैं जाकर कैमरा ख़रीद रहा था. उन दिनों की स्मृतियाँ अभी भी सपने से कम नहीं हैं. हम सबके दिल में शादी अगर सपने से निकल आया एक सपना है तो उसके बाद के दिनों की कल्पना सपनों की महक से कुछ कम नहीं होगी. उन्हीं दिनों की बात रही होगी. सोचता रहा, इसी नए कैमरे से कहीं घूमने जायेंगे, तब यही हम दोनों की साथ-साथ पहली तस्वीरें खींचेगा. कहाँ जायंगे, यह तय नहीं था. कहीं जायेंगे, यह पता था. शादी में सारी तस्वीरें इसी से खींची गयी. हम दोनों साथ-साथ हैं. इन्हीं तस्वीरों से पहली मर्तबा तुम्हें अपनी तरफ़ खींचे ले रहा था. तुम सच में खिंची चली आ रही थी. यह बात भी तुम्हें कभी नहीं बताई.

आज भी मार्च का कोई दिन है. शाम ढल रही है. इस बात को अपने मन में सोचता हूँ. उसे छूना नहीं चाहता. पर कभी-कभी होता है न. अपने आप केंचुए की तरह यह रेंगने लगती हैं. हम कहीं नहीं गए. कोई तस्वीर नहीं खींची. बस इसी बात को याद करने के लिए लिख रहा हूँ, हमें कहीं जाना है. हर बार जब इस टेक पर आता हूँ तब लगता है, सोचा जाना और उनका वैसा हो जाना असल में दो अलग-अलग बातें हैं. एक कल्पना है. जो हमारे मन में न जाने कितनी बार घटित हो सकती है. उसका वास्तविकता में एक बार भी हो जाना कितना कठिन है, यह हम जानते हैं.

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

आबू रोड, 2007

शहतूत आ गए हैं: मेरी पहली किताब

हिंदी छापेखाने की दुनिया

जगह

हंस में आना

वापसी

आठवीं सालगिरह