अनदेखे अनजाने

कल की बात है। क्लस्टर बस थी। नारंगी रंग की। कमला मार्किट से मुड़ रही थी। उसका ड्राइवर टीबी के मरीज़ की तरह खाँस नहीं रहा था। बस मरने से पहले जिन्दा कंकाल बनने की तय्यारी में था। साफ़ दिख रहा था, वह अतीत से अपने वर्तमान में बीड़ी पीता हुआ आया है। बीड़ी फेफड़ों को खोखला करती जाती है। उन्हें सोख लेती है। लोग बीड़ी क्यों पीना शुरू करते हैं, हम इनसे पूछकर जान सकते हैं। पर पूछते नहीं हैं। मैंने भी नहीं पूछा। मन तो बस यही सोचता रहा, अपनी ज़िन्दगी में आज तक सड़क पर गाड़ी चलाते हुए इन्हें कितने चहेरे याद रह गए होंगे? यह सवाल जितना उनके लिए ग़ैर ज़रूरी है, उतना ही हमारे लिए भी है। बचपन से आज तक अनगिन बार बस से उतरते-चढ़ते कितने साल हो गए(?) पर एक भी चहरा याद नहीं हैं, जो उसी बस में उसी वक़्त साथ सफ़र कर रहा होता। चुप्पी इसका कोई जवाब नहीं हो सकती। एक बार फिर खुद से पूछता। फिर कोई जवाब नहीं मिलता। हम खुद कितने लोगों को चहरे से याद रख पाते हैं? यह ड्राइवर जो इस गाड़ी चलते हुए मुझे अम्बेडकर स्टेडियम तक ले आया है, उसे कब तक याद रख पाउँगा? 

इतने सालों में बनते-बनते यह सवाल बनता दिख रहा है कि वह कौन से ख़ास चहरे हैं, जो याद रह जाते हैं? याद रह जाने के लिए चेहरे में क्या होना चाहिए? कभी महसूस हुआ है, यह चेहरा हमारे बाकी अंगों को पीछे धकेलता हुआ सबको पछाड़ देता है? कोई लड़की, किसी लड़के को उसके नितम्भों से पहचानने का दावा नहीं करती। कोई लड़का, किसी लड़की को उसके स्तनों से पहचान सकता है, पर पूछने पर कहेगा नहीं। हम इस समाज और अपनी सीमाओं को जानते हैं। यह चेहरा उन्हें, उन सब ख्यालों को ढक लेता है। पर यह बात यहाँ आगे जाती लग रही है। हमें किन चेहरों को याद रखने के लिए मज़बूर किया जा रहा है? वह कौन से चहरे हैं, जो बार-बार हमारी मर्ज़ी के बिना हमारे सामने आ जाते हैं? इस समय के विशेष दबाव को सबसे जादा शायद यह चेहरा ही महसूस करता होगा। ध्यान से देखिये अगर आप इस चेहरे को समझ गए, तब आपको यह दुनिया और बेहतर समझ में आने लगेगी। किन्हें हमारे समय का नायक-नायिका बनाया जा रहा है? उन्हें चुनने की कसौटियां क्या है? वही क्यों चुने जा रहे हैं?

इन सबके कोई तयशुदा जवाब नहीं हैं। कईयों के लिए हो सकता है, यह सवाल ही नहीं होंगे। तब उन्हें ख़ुद से पूछना चाहिए कि उन्होंने आख़िरी बाद द्वारका से मंडी हाउस पहुँचाने वाली दिल्ली मेट्रो के ड्राइवर को आख़िरी बार कब देखा था? यह वही मेट्रो है, जो अजनबियों से बचकर रहने की चेतावनियों को गढ़ रही है और हमें एक दूसरे के चेहरों में झाँकने से रोक रही है। जब मैं किसी की आँखों में देखूँगा ही नहीं तब मुझे कैसे पता चलेगा, उसके काजल में ठहरी दमकती हुई खुशी। उसके चेहरों पर भाकर थम गए आँसुओं की रेखाएँ। हथेलियों का खुरदरापन।

टिप्पणियाँ

एक टिप्पणी भेजें

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

बेतरतीब

आबू रोड, 2007

हंस में आना

शहतूत आ गए हैं: मेरी पहली किताब

हिंदी छापेखाने की दुनिया

जगह

वापसी