थूक वाली ऊँगली

वह कौन लोग हैं और उनकी पहचान कैसे की जा सकती है, जो ऊँगली में थूक लगाकर किताब के पन्ने पलटते हैं? मैं एक को जानता हूँ. आज ही मुलाक़ात हुई है. जानना सिर्फ़ इस बात का है कि उसने मेरी किताब के पन्नों को इस तरह पलटा. उसके पास इसके अलावे और कोई ख़याल क्यों नहीं आया, कहा नहीं जा सकता. पर जितनी तन्मयता के साथ वह किताब पढ़ रहा था, उससे यह बिलकुल भी जज नहीं किया जा सकता कि किताबों को लेकर वह असल में क्या सोचता है? मैं भी कोई फ़िज़ूल दिमाग लगाने वाला नहीं हूँ. बस थोड़ा सोचने लगा. वह ऐसा क्यों कर रहा होगा? शायद किसी ने उसे कभी टोका नहीं होगा. अगर मैं उसके ऐसा करने पर यहाँ बैठकर लिखने बैठ गया हूँ शायद यह एक तरह का टोकना ही होगा. कहीं न कहीं मेरे अन्दर यह बात घर कर गयी होगी के किताबों को थूक वाली ऊँगली से नहीं पलटना चाहिए. इस तरह हम दो अलग-अलग लोग हैं. अगल-बगल बैठे थे. ऐसे लोग ट्रेन, बस, मेट्रो में अकसर मिल जाते हैं, जो कभी किताब तक नहीं पहुँचे होंगे. हो सकता है, उनके लिए किताबें आज तक पढ़ी जाने वाली चीज़ बनकर रह गयी हों. उनके लिए किताबें ख़रीदे जाने वाली इकाई में तब्दील होते-होते पता नहीं कितना और वक़्त लेंगी? या कभी ले भी पाएँगी, पता नहीं. 

2. इस थूक से और ऊँगली पर लगे थूक से किसी को कोई दिक्कत नहीं होती होगी, ऐसा नहीं है. आधुनिक चिकित्सा विज्ञान कई रोगों को इन्हीं से जन्मा हुआ मानता है. इस शहर में आप हर जगह थूक नहीं सकते. थोड़ी देर के लिए इस स्वच्छता अभियान की मनः स्थिति और इतने तार्किक आधारों को अपने अन्दर से निकालकर देखिए. मेरे अन्दर यह ख़याल क्यों आया होगा, इसकी छाया यहीं कहीं बन रही है. बचपन में पापा ने कभी कहा होगा. ऐसा नहीं करते. उन्होंने कारण भी बताये होंगे. किताबों से प्यार करना, उन्हें सहेज कर रखना भी सीखते गए होंगे. किताब कागज़ की बनी है. उसे पानी से बचाना है. थूक भी पानी से कम नहीं है. जीभ और दाँतों के बीच रहते-रहते उसमें कई तरह की और चीज़ें मिल जाया करती है. ऐसा व्यवहार वह अपनी किताब से करेगा, उसे तब भी ऐसे ही लूँगा.

3. इस तस्वीर को देख कर किसी मुगालते में पड़ने की ज़रूरत नहीं है. शर्तिया ये वह तो बिलकुल भी नहीं हैं, जिनसे मेरी मुलाक़ात हुई थी. और दूसरी ज़रूरी बात कि किताब पर यह जो थूक लगाने वाली बात है, उसमें कहीं-न-कहीं किताबों को लेकर हमारे भीतर किसी सांस्कृतिक छवि की निर्मिती अपना काम कर रही होगी, ऐसा सोचने वाले भी कम नहीं होंगे. अगर ऐसा है, तब आप गलत जगह पर आये हैं. किताबें कितना वक़्त माँगती हैं. कितने सारे वाक्य, कितनी स्याही और कितना सारा श्रम लगा होगा? जिल्दसाज़ से लेकर उस टाइप करने वालों को कितनी रात काम करना पड़ा होगा. प्रूफ़रीडर की आँखें दुख रही होंगी. सिर्फ़ किताब भर ख़रीद लेने से इन सारी न दिखने वाली चीज़ों को भी हमें ख़रीद लिया, यह सोचना बेवकूफी है हमारी. बेवकूफ़ कहीं के. फ़िर कागज़ क्या अपने आप बन गया? पेड़ से बना है जनाब. किताब का कच्चा माल. थोड़ा इसलिए अपनी कल्पना में उस पेड़ को ही याद कर लिया कीजिये.

{पॉलिटिकली करेक्ट होने की कोशिश में, शाम का एक पन्ना. 
फ़िर किन्डल अभी ख़रीदा नहीं है, जब वह पास आ जायेगा, तब उस किताब पर भी कभी लिखेंगे कुछ..}

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