वक्त..

हम लोग सोचते हैं, हम वक़्त की कीमत नहीं लगा सकते. यह सोचना हमारी बेवकूफी को बताने के लिए काफ़ी है. हम कितने भोले हैं, जो किसी किताब को खरीदते वक़्त नहीं सोचते कि वह सिर्फ़ कुछ पन्नों को एक साथ कर देने से किताब नहीं बन गयी. वहाँ कितनी ही निशानियाँ छूटी रह गयी हैं. वह ज़िल्दसाज़, उसके हाथों में लगी न मिटने वाली रौशनाई, मशीन से कट गयी ऊँगली का दर्द. कुछ भी तो कहीं दर्ज़ नहीं हो पाता. उसे किताबों से बाहर ही रहना होगा. वह रेखाएँ इसी गुज़रते वक़्त को कैद करने के मकसद से वहाँ बन गयी हैं. उसे लिखने वाले से सीधे छापेखाने में आकर नहीं लिखा होगा. उसने लिखने की वह घड़ियाँ उसने अपनी माँ या पत्नी के खातों से चुरायी होंगी. जिस वक़्त वह अजीब-सी बातों को कह देना चाहता होगा, उस वक़्त उसके लिए रसोई में खाना बनती अपनी अम्मा के रोटी बनाते हाथों को महसूस भी नहीं कर रहा होगा. गुसलखाने में तीन घंटे से घुसी उसकी पत्नी को कभी पता नहीं चलता कि उसका पति वहाँ छत पर बैठे-बैठे उसके बारें में क्या कहने की कोशिश कर रहा है. उसने कभी पिता से पूछा भी नहीं होगा कि उसके पिता साइकिल पर केला ख़रीद कर लाते हुए क्या सोच रहे होते हैं.

पर क्या वक़्त इतनी सीधी सरल रेखा में ख़त्म हो जाने वाला विन्यास है? ऐसा नहीं होगा. हम जो उस किताब को अपने खाली वक़्त में पढ़ रहे हैं, इतना वक़्त कहाँ से लेते आये हैं? हम जानते हैं, किनकी कीमत पर हमने यह घड़ी चुरायी है. पर जताना नहीं चाहते. उसे जताते ही वह हमारे हाथों से रेत की तरह फिसलने लगेगा.

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