पाश का दिन

जबसे यहाँ आया हूँ, एक ख़ास तरह के एहसास को अपने अन्दर से जाता हुआ देख रहा हूँ. अन्दर से कभी लगता ही नहीं कुछ लिखा है. यहाँ लिखना ऐसा लगता है, जैसे किसी ख़त्म होती घड़ी में यहाँ आये भी तो बस छूकर भाग लिए. मन नहीं करता तब भी चला आता हूँ. पर जब एकांत के क्षणों को इन पंक्तियों में तब्दील नहीं कर पाता तो लगता, अन्दर कोई तस्वीर गुम होती जा रही है. अपने अक्स को पानी में घुलते हुए देखना और ऊपर से स्याही फेंक देना ऐसा ही होता होगा. यह जो अपने अन्दर कभी जूझने की खूबी रही होगी, अब कहीं गुम होती लगती है. 

यह सब मुझे दो तरह से बुन रहा है. या हो सकता है और भी दिशाएँ हों, जिन्हें देख न पाने के दृष्टिदोष से ग्रसित होकर जनरल वार्ड का ट्रीटमेंट देता हुआ यहाँ से सिर झुकाए थके से डॉक्टर जैसे निकल लेता होऊँगा. निकल जाना, बच जाने की कोई शरारत होती होगी. इसी शरारत में कहीं बचपना छिपा हो तो शायद कुछ बात बन जाये.

जब रोज़ कुछ-न-कुछ लिख रहे होते थे, तब बहाना था इस कारण पढ़ नहीं पा रहे हैं. पर जबसे कागज़ पर लिखने से पहले उन पन्नों का खालीपन आँखों में उतरने लगता, तब तो ख़ाक कुछ लिखा जाता. तब से हुआ कुछ नहीं है, मेज़ पर किताबों के पहाड़ बनते गए और आज हालत यहाँ तक आ गए हैं कि इस प्यारी मेज़ पर सिर्फ़ लैपटॉप जितनी जगह बचा पाया हूँ. मेरी नोटबुक जिसे अपनी डायरी कहता हूँ, वह भी इससे कुछ सेंटीमीटर जादा जगह घेरती है. और लिखते वक़्त तो कोहनी, कलाई और पता नहीं क्या-क्या वहाँ मेज़ की सतह पर घिसता रहता है.

ख़ुद में वापस जाने के लिए लगता नहीं था इतने महँगे टिकट लगेंगे कि उसकी भरपाई होते-होते होगी. पढ़ना जादा है, वक़्त है नहीं. जो है, वो सोने और घूमने से बच जाये तो थकान के मारे अधमरे होकर ख़ुद से बाहर खर्च हो जाता है. फ़िर जितना बचता हूँ उसमें ताकत इकट्ठी करके सोचता हूँ ये छापेखाने न ही बने होते तो ठीक रहता. हर वक़्त लगता रहता है, इस छोटी-सी दुनिया को समझने के लिए जिल्दें कुछ जादा नहीं छप गयी? चलो छप गयीं हमारी बला से. पर हमें किस बिच्छु ने काट लिया कि जब मन करता है कोई-न-कोई किताब घरे उठा लाने के लिए छटपटाने लगते हैं. और तब हमारी सारी आर्थिक उर्जा उसे घर की इस इकलौती मेज़ पर लाकर पटकने में खर्च हो जाती है.

आज इस ढलती हुई रात में यह पन्ना भी इसलिए लिखा गया क्योंकि यह तारीख अवतार सिंह संधू की है. हमारे पाश की है. हमने इस दुनिया में देखा, कहना सामने आ जाना है. पहचान का खुल जाना है. पहचान खुलना, भेद खुलने जैसा मानकर मर जाने की तय्यारी है. पर मैं ऐसा कुछ भी नहीं कहना चाहता, जिससे मेरी पहचान ज़ाहिर हो जाये. ज़ाहिर हो जाना निशानदेही करवाना है. उनके सबके सामने आ जाना है, जो घात लगाकर बैठे हैं.

जिनके हाथ खून से रंगे हुए हैं. उनके पास पूरी लिस्ट है. घात लगाकर मैं भी बैठा हूँ, किसी को मारने के लिए नहीं. लिखने के लिए. और उनकी तरह मेरे हाथ भी रंगे हैं. खून से नहीं. थोड़ी सी कलम से निकलने वाली स्याही से.

{यह सब रुकने वाला कहाँ था(?) रात के बाद आई अगली सुबह की डाक, बेचैनियाँ. }

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