कहना, नहीं कहना

देख रहा हूँ सब कह रहे हैं. कहने के लिए कहते जा हैं. जो अन्दर से जितने खोखले हैं, उतने ही कहने को उतावले हैं. मैं भी कभी हुआ करता था. अब चुप हूँ. चुप रहना मेरे लिए कहना है. कहने से बढ़कर है, न कहना. न कहने पर सब सोचते हैं, इसके पास कहने के लिए बहुत कुछ है. जब कहेगा, तब क्या बात कहेगा? अभी जब से सोकर उठा हूँ, बस सोच रहा हूँ, इस खिड़की के बाहर हो रही बारिश की एक बूंद भी मुझे छू नहीं पायी है. ऐसा क्या हुआ होगा जो छू नहीं पा रहा? उसमें शाम की ठंडक कुछ कम होगी. फ़िर हर चीज़ छींक की तरह नहीं हो सकती. अपने होने के क्षण सिर्फ़ वही होती है. यह चींटे जो कमरे में जहाँ-तहाँ घूम रहे हैं क्यों घूम रहे हैं? क्या गुम हो गया है इनका? वह छिपकली ट्यूबलाइट के आस पास ही क्यों रहती है? क्यों वह अपनी जगह छोड़ कर कहीं नहीं जाती? पता नहीं ऐसे कितने सवाल हैं, जिनको जवाबों की शक्ल में लिखना चाहता हूँ. पर लिख नहीं पाता. अभी जब लिख रहा हूँ, तब खिड़की के बाहर कहीं गिलहरी चहचहा रही है. सब उजाले के साथ कुछ-न-कुछ कहना चाहते हैं. मैं भी कुछ कहने की कोशिश में हूँ. पर इस कह नहीं पाने को अपने अन्दर महसूस कर रहा हूँ. क्या हम बार हम किसी के कहने को ही सुनेंगे. न कहे को भी तो सुन सकते हैं.

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