परछाईयाँ बची रह गयीं

हिरोशिमा में आज से इकहत्तर साल पहले बिलकुल इसी पल सब पिघलकर भाप बन गए. पिघलकर कुछ नहीं बचा. सोचने का वक़्त भी नहीं. कल कैसा होगा? कल उनके आज से डरावना नहीं हो सकता था. उनके भाप बन जाने के दरमियान वह सब कुछ सोच भी नहीं पाए होंगे. ऐसा दावे के साथ इसलिए भी कहा जा सकता है क्योंकि बम गिराने से आज तक अमेरिका इस सम्बन्ध में कोई साक्ष्य खोज नहीं पाया है. उनका विज्ञान बस यह बता पाया कि आसमान से उस दिन गिराए बम से जो चार हज़ार डिग्री की गर्माहट निकली, जिसने सबको निगल लिया. चार हज़ार डिग्री तो काफ़ी होता होगा किसी को भी पिघलाने के लिए, ऐसा सोचकर उन्होंने राहत की साँस ली होगी. कितना ज़रूरी है साँस ले पाना. चाहे इसके लिए दूसरे किसी भी व्यक्ति को साँसें लेने न दी जाएँ. उन सबकी साँसें नहीं बचीं. बस बची रह गयीं परछाईयाँ. उन्होंने कभी सोचा भी नहीं होगा, एक परमाणु बम उनकी परछाईयों को हमारे अन्दर इस तरह उतरते हुए चला आएगा. वह पत्थर उस गरमी में भी नहीं पिघल पाए. उन्होंने सबको बचा लिया. उनकी स्मृतियों के यह स्मारक भी उनके साथ हमेशा के लिए उड़ गये होते, अगर वह पत्थर न होते. इसलिए कभी कभी सोचता हूँ कभी पत्थर हुआ तो ऐसा पत्थर हो जाऊँगा, जो अपनी कहानी कह सके. चुप न रहे.

अब कहने का मन नहीं है. बस सोचता हूँ, अगर मैं भी एक जापानी होता और उस वक़्त वहाँ होता, तब मेरे सारे सपनों का क्या होता? सब भाप बनकर उड़ जाते और कभी सच भी न हो पाते. ऐसा सोचना भी कितना डराता है, जहाँ कल कभी नहीं आ पाया. कल, जो हमेशा उम्मीद लेकर आता है. कभी सपने में भी नहीं लौट पाया. कभी नहीं.
 

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